Nav Pad Oli Day 1 | Arihat Bhagvant Aaradhana & Pravachan | Jain Stuti Stavan

 Nav Pad Oli Day 1

Shree Arihat Pad

श्री अरिहंत पद 

देव , गुरु और धर्म इन तीनो को अपने में समाहित करने वाले 
श्री सिद्धचक्र - नवपद में श्री अरिहंत पद प्रथम स्थान में विभूषित है

                    अरिहंत बनने वाली आत्मायें अपने पूर्व भव में सम्यक्त्व प्राप्तकर अपना संसार सीमित कर लेती है। तीसरे पूर्व भव में वीश स्थानक तप को सुंदर आराधना करके निकाचित रूप से तीर्थंकर नाम कर्म बांधती है। संपूर्ण विश्व के जीव दुःख से मुक्त हो , इस भावना से तथा जीवमात्र को धर्म मार्ग में जोड़ने के दृढ़ संकल्पों द्वारा तीसरा भव पूर्ण करके , मध्यम भव देव या नरक का भी पूर्ण करके , पुनः मनुष्य भव में उत्तम राजकुल में माता की कुक्षी में उत्पन्न होता है। उस समय माता चौदह महा स्वप्न देखती है। इंद्र महाराजा स्तुति स्तवना करते है। गर्भ का काल पूर्ण होते ही शुभ लग्न में माता पुत्र रत्न को जन्म देती है। सर्वत्र क्षणभर बिजली के सदृश प्रकाश होता है। त्रस - स्थावर सभी जीवों को आनंद की अनुभूति होती है। छप्पन दिग्कुमारिकाऐं अपने अपने स्थान से आकर सूतिकर्म का कार्य करती है। चौसठ इंद्रो , इंद्राणिया , देव , देवीयों सहित मेरु पर्वत पर जन्माभिषेक महोत्सव मनाते है। जन्म से चार अतिशय होते है। उनका आहार और विहार चर्मचक्षु वाले नही देख सकते है। मति , श्रुत और अवधिज्ञान ये तीनो ज्ञान पूर्ण से ही उनके साथ में रहते है। प्रलिप्त भाव से भोगते हुए भोगों को भी जैसे सर्प काँचली को त्यजता है वैसे तजकर , वार्षिक संवत्सरी दान देकर प्रवज्या स्वीकार कर , चतुर्थ मनःपर्यवज्ञान प्राप्त करते है। अनुकूल प्रतिकूल सर्व उपसर्गो को समभाव से सहन कर , अप्रमत्तपणे चारित्र धर्म की अखंडित आराधना के साथ शुक्ल ध्यान की धाराएँ चढ़कर , चार घाती कर्मो का सर्वथा क्षय करके केवलज्ञान और केवलदर्शन जिन्होंने प्राप्त किया ऐसे तीर्थंकर नाम कर्म उदय वाले श्री अरिहंत भगवंत सर्वज्ञ सर्व दर्शी बने। 

अरिहंत का अर्थ
अरि याने शत्रु तथा हंत याने हनने वाले। अर्थात जिसने कर्मरूपी शत्रु हने है ,
 विनाश किये है वो अरिहंत कहे जाते है। 

                       चौतीस अतिशय से युक्त , अष्ट प्रातिहर्यो से परिपूर्ण , देवो ने जिनके लिये समवसरण की रचना की है। अरिहंत पद का श्वेत वर्ण है। 

                       पूज्य श्री भद्रबाहु स्वामी महाराज ने श्री आवश्यक सूत्र की नियुक्ति में अरिहंत के बारे में कहाँ है कि , जो इन्द्रियों के विषयों , कषायों , परीषहों और वेदनाओ का विनाश करने वाले हो वे अरिहंत कहलाते है। जो सब जीवो के शत्रुभूत उत्तर पकृतियों से युक्त आठ कर्मो का विनाश करने वाले हो वे अरिहंत कहलाते है। जो वंदन , नमस्कार , पूजा और सत्कार के योग्य हो , मोक्षगमन के लायक हो , सुरासुरनरवासव से पूजित हो तथा अभ्यंतर शत्रुओं का विनाश करने वाले हो वे अरिहंत कहलाते है। 

                  पूज्य कलिकालसर्वज्ञ श्री हेमचंद्रसूरिश्वरजी महाराज ने भी योगशास्त्र में कहा है कि - जो सर्वज्ञ है , जिन्होंने रागादि दोषों को जीता है , जो त्रैलोक्यपूजित है , जो पदार्थ जैसे है उनका वैसा ही यथार्थ विवेचन करते है , वे अर्हत परमेश्वर कहलाते है। 

                      अरिहंत पद की आराधना से देवपाल राजा राज्य के स्वामी हुए है। और कार्तिक श्रेष्ठी इंद्र बने है। 

                       जी भवसिंधु से स्वयं तरे है और जिन्होंने दूसरे को तारने के लिए अनुपम मार्ग का प्रकाशन किया है , ऐसे भवसिंधु तारक श्री अरिहंत देव श्री नवपद में प्रथम पदे पूज्य है। ऐसे श्री अरिहंत परमात्मा को हमारा नमस्कार हो। 

Arihat Bhagvant Pad Pravachan | Navpad Oli 2021




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