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6 May 2019

एक मुनिराज की आत्मकथा - एक अनगार (भाग 1)

एक अनगार
जिन शासन का वास्तविक श्रृंगार
jain stuti stavan

एक ऐसे अनगार जो वास्तव में जिनशासन के श्रृंगार है ।

जिनके चारित्र जीवन की खुशबु पूरे भारत भर में महक रही हैं । ऐसे महात्मा का जीवन उल्लेखनीय 
वंदनीय, आकर्षक एवं अनुमोदनीय है । जिन्हे देख स्वत: उनके चरणों में मस्तक ज्ञूक जाए । ऐसे 
पूजनीय गुरू भगवंत की यह आत्मकथा हम गच्छ, सम्प्रदाय, समाचारी से उधर उठ अहोआव से पढे, 
पढाये व अपने आप क्रो धन्य बनावे....यही शुभेच्छा । 

वर्तमान काल के इस आधुनिक युग में सच्चे संयमधर्प को आराधना हेतु अनुकुंलत्ताए इस हद तक घट 
चुकी है कि संयम धर्म जिना दुष्कर हो चुका हैं ।२५०० वर्ष पूर्व भी धर्मदास मणि ने कहा था कि भाई 
यह तो पडता काल संयम योग्य क्षेत्र बचे ही नहीं है ।

भगवान महावीरस्वामीजी की हाजरी में उनके शिष्यरत्न ऐसा कहते थे अब तो २५०० वर्ष बाद भयानक

विनाशकारी बिज्ञानवाद की भूतावल की हाजरी में भला क्या दशा होगी ? आज की स्थिती यर चारों 
तरफ नजर दौड़ाये तो चाहे जो व्यवहारिक, व्यापारिक, सामाजिक, राजनैतिक या शिक्षण इत्यादि 
कोई भी क्षेत्र में मुशिकल से ५ प्रतिशत शुद्धि रह गई है। वहीं दूसरी तरफ एक श्रणणसंघ ही 
ऐसा है जहाँ ७५ प्रतिशत से ८० प्रतिशत अकबंध शुद्धि है । यह बात्त हमेंशा ध्यानमें रखनी हैँ 
ताकि हमारा नजरिया, अहोप्राव श्नमणसंघ की तरफ़ सही रहे...

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