1 August 2020

History Of Chandanbala | साध्वी चंदनबाला

साध्वी चंदनबाला



शताब्दियाँ बीत जाने पर भी आज चंदनबाला का चरित्र प्रेरणा की दीपक के समान है । जैन इतिहास की सोलह प्रमुख सतियों में महासती चंदनबाला निजी अग्रिम स्थान रखती है । चंदनबाला ज्ञानवती , गुणवती एवं तपस्विनी तो थी ही , परन्तु दीक्षा ग्रहण करने के पश्चात् भगवान महावीर द्वारा प्रवर्तित साध्वी-संघ की प्रथम साध्वी बनी और 36000 साध्वियों के संघ की साध्वी - अध्यक्षा बनी



चंपानरेश महाराज दधिवाहन और महाराणी धारिणी की पुत्री वसुमती अर्थात चंदनबाला अपनी माता से त्याग , सहिष्णुता एवं धर्मनिष्ठा की उच्च भावनाएँ प्राप्त कर चुकी थी । माता स्वयं उच्च कोटि की विदुषी , विचारक एवं धर्मनिष्ठ सन्नारी थी । बचपन के संस्कारों के फलस्वरुप आत्मकल्याण के लिए आतुर राजकुमारी वसुमती ने अविवाहित रहने का निर्णय किया । वसुमती के उच्चाशयों को जानकर माता-पिता ने पुत्री को अपने व्रत में दृढ़ रहने की सहर्ष अनुमति दी । कौशाम्बी के राजा शतानीक ने आक्रमण किया और चंदनबाला को दासी के रुप में बेचा गया । इस समय धनवाह सेठ ने समुचित मूल्य देकर चंदनबाला को वेश्या के हाथों में जाते हुए बचा लिया । चंदनबाला का अनुपम सौंदर्य , निष्ठापूर्ण सेवा एवं साहजिक विनय ऐसे थे कि कोई भी उन्हें आदर दे , परन्तु पुरुष से प्राप्त ऐसा आदर विधि की विचित्रता के कारण द्वेष का कारण बना । धनवाह सेठ चंदनबाला को पुत्री की तरह रखते थे ।

एक बा बाहरगाँव गये हुए धनवाह सेठ वापस आये , तब उनके पाँव धुलवाते हुए चंदनबाला की चोटी गिर गई । गंदे पानी में गिरि हुई दासी चंदना के बाल की लट को रोकने के लिए उसे पकड़कर धनवाह सेठ ने ऊपर उठाया । उस समय धनवाह सेठ की पत्नी मूला सेठानी ने यह दृश्य देखा और उसके हृदय में ईर्ष्या की आग भड़क उठी । धनवाह सेठ बाहरगाँव गये , तब मूला सेठानी ने चंदना का सिर मुँड़वा डाला । उसके पाँव में बेड़ियाँ डलवाई और उसे तलघर ( तहखाना ) में धकेल दिया । तीन दिनों तक वह भूखी -प्यासी रही । धनवाह सेठ वापस आये । उन्हें सच्ची परिस्थिति का ख्याल आते ही उन्होंने तत्काल लुहार को बुलाने का विचार किया । इस समय सूप में पशुओं को खिलाने के लिए उरद का साबूत उबाला हुआ दलहन रखा था , वह भूखी चंदना को खाने को दिया ।

भगवान महावीर ने इस कौशांबी नगरी में पधारने के पश्चात् घोर अभिग्रह ( अतिक्रमण ) किया था । प्रथम द्रव्य से ऐसा अभिग्रह था कि आहाररुप में उरद का उबाला हुआ दलहन स्वीकार करना और वह भी सूप के कोने में हो तभी ग्रहण करना ।क्षेत्र से ऐसा अभिग्रह था कि जिसका एक पाँव देहली के अंदर और एक पाँव देहली के बाहर हो उससे ही स्वीकारना । समय (काल) का ऐसा अभिग्रह कि भिक्षा लेनेवालों का समय अर्थात दोपहर के भोजन का समय बीत जाने के बाद मिले तो स्वीकारना । इसके अतिरिक्त भाव से ऐसा अभिग्रह था कि वह राजकुमारी हो और साथ ही वह दासत्व को प्राप्त हुई हो ! उसके पग में बेड़ी हो , सिर मुंडन किया हुआ हो , आँखों में आँसू हो , अट्ठम तप किया हो और साथ ही वह पवित्र सती स्त्री हो ।ऐसी स्त्री भिक्षा दे तभी भिक्षा लेना । पाँच महिने और पच्चीस दिन के पश्चात् भगवान महावीर चंदनबाला से भिक्षा लेते है । सबकों सच्चाई का ख्याल आ जाता है । उसकी हथकड़ी और पाँव की बेड़ियाँ टूट जाती है । पहले-सी ही सुंदर केशराशि हो जाती है । भगवान ने जैसे ही भिक्षा ग्रहण की कि आकाश से पुष्पवृष्टि हुई । राजा शतानीक और मूला सेठानी ने अपने दुष्कृत्यों के लिए क्षमा-याचना की ।

भगवान महावीर का उपदेश सुनने के बाद दीक्षित हुई चंदनबाला भगवान की प्रथम शिष्या एवं श्रमणी संघ की प्रवर्तिनी बनी ।

मानवजाति को उचित मार्ग दर्शाते हुए चंदनबाला ने दिव्य ज्ञान की प्राप्ति की ।


साभार : जिनशासन की कीर्तिगाथा

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