चक्रवर्ती सम्राट चंद्रगुप्त मौर्य: राजपाठ त्याग कर मुनि बनने तक का ऐतिहासिक सफर
जय जिनेन्द्र!
प्राचीन भारतीय इतिहास के पन्नों में जब भी अखंड भारत के निर्माण, शौर्य, और सबसे विशाल साम्राज्य की बात आती है, तो 'मौर्य साम्राज्य' (Mauryan Empire) और उसके संस्थापक चक्रवर्ती सम्राट चंद्रगुप्त मौर्य का नाम सबसे ऊपर स्वर्णाक्षरों में लिखा जाता है। हम सभी ने बचपन से इतिहास की किताबों में चंद्रगुप्त मौर्य की वीरता, उनके द्वारा यूनानी शासक सेल्यूकस निकेटर (Seleucus Nicator) को हराने, और महामात्य चाणक्य की कूटनीति से नंद वंश का नाश कर मगध पर विजय प्राप्त करने की गौरवशाली कहानियाँ पढ़ी हैं।
लेकिन, भारत का यह महान इतिहास केवल युद्धों और विजयों तक सीमित नहीं है। जैन इतिहास, प्राचीन आगमों, और ऐतिहासिक ग्रंथों में चंद्रगुप्त मौर्य का एक ऐसा अलौकिक और आध्यात्मिक स्वरूप भी वर्णित है, जो सत्ता, वैभव और तलवार की चमक से बहुत दूर, 'त्याग, तपस्या और वैराग्य' की चरम सीमा को छूता है। कलिकालसर्वज्ञ श्वेतांबर आचार्य श्री हेमचंद्र सूरी जी द्वारा 12वीं शताब्दी में रचित विश्व प्रसिद्ध और प्रामाणिक ग्रंथ 'परिशिष्टपर्वन' (स्थविरावली चरित) में चंद्रगुप्त मौर्य के संपूर्ण जीवन और उनके जैन धर्म के प्रति अटूट समर्पण का अत्यंत सजीव, विस्तृत और मार्मिक वर्णन मिलता है।
आइए, जैन इतिहास के उन सुनहरे पन्नों को विस्तार से पलटें और जानें कि कैसे आधी दुनिया पर राज करने वाला, सोने के सिंहासन पर बैठने वाला एक चक्रवर्ती सम्राट, सब कुछ त्याग कर एक श्वेतांबर जैन मुनि बन गए और तपस्या के मार्ग पर चलते हुए अपने प्राणों का उत्सर्ग किया।
1. ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और जैन ग्रंथ 'परिशिष्टपर्वन' का महत्व
सम्राट चंद्रगुप्त मौर्य के जीवन को समझने के लिए जैन ग्रंथ 'परिशिष्टपर्वन' (Parishishtaparvan) एक मील का पत्थर है। इसे 'स्थविरावली चरित' भी कहा जाता है। आचार्य हेमचंद्र सूरी जी ने इस ग्रंथ में भगवान महावीर के बाद हुए महान जैन आचार्यों (स्थविरों) और उनके समकालीन राजाओं के इतिहास को बहुत बारीकी से संकलित किया है।
इस ग्रंथ के अनुसार, जैन धर्म का भारतीय राजनीति और राजघरानों में बहुत गहरा प्रभाव था। केवल चंद्रगुप्त मौर्य ही नहीं, बल्कि उनसे पहले मगध पर राज करने वाले नंद वंश के राजाओं के दरबार में भी जैन मंत्रियों का वर्चस्व था। 'कल्पक' नामक एक अत्यंत विद्वान जैन श्रावक नंद वंश का पहला मंत्री था, और उसी के वंशजों ने पीढ़ियों तक मगध के मंत्री पद को सुशोभित किया था। इसी राजनीतिक और धार्मिक पृष्ठभूमि में चाणक्य और चंद्रगुप्त का उदय हुआ।
2. आर्य चाणक्य का जैन मूल और अखंड भारत का संकल्प
आधुनिक इतिहास में अक्सर चाणक्य (कौटिल्य या विष्णुगुप्त) को केवल एक वैदिक ब्राह्मण के रूप में प्रस्तुत किया जाता है, लेकिन जैन ग्रंथ 'परिशिष्टपर्वन' एक बिल्कुल अलग और बेहद रोचक जानकारी देता है।
चाणक्य की जैन पृष्ठभूमि: ग्रंथ के अनुसार, चाणक्य जन्म से ही जैन धर्म के श्रावक (अनुयायी) थे। उनके पिता का नाम 'चणक' था, जो एक अत्यंत निष्ठावान जैन श्रावक थे और गोल्ल विषय (वर्तमान में दक्षिण भारत या गुजरात के किसी हिस्से) के निवासी थे। पिता के नाम पर ही उनका नाम 'चाणक्य' पड़ा। चाणक्य को जैन दर्शन, कर्म सिद्धांत और जैन मुनियों के कठोर आचरण का बहुत गहरा ज्ञान था।
जब चाणक्य ने पाटलिपुत्र के राजदरबार में नंद राजा (घनानंद) द्वारा किए गए अपमान का घूंट पिया, तो उन्होंने नंद वंश के समूल विनाश की कठोर प्रतिज्ञा ली। अब उन्हें एक ऐसे योग्य, वीर और बुद्धिमान बालक की तलाश थी जो भविष्य का चक्रवर्ती सम्राट बन सके और एक अखंड साम्राज्य की स्थापना कर सके।
चंद्रगुप्त की खोज: चाणक्य की यह तलाश एक ऐसे गाँव में पूरी हुई जहाँ 'मयूर-पोषक' (मोर पालने वाले) रहा करते थे। उस गाँव के मुखिया का दत्तक पुत्र था—चंद्रगुप्त। बालक चंद्रगुप्त बचपन से ही अपने खेल-खेल में राजा बनकर न्याय करने का अभिनय करता था। चाणक्य ने चंद्रगुप्त के भीतर छिपे एक महान सम्राट के लक्षणों को पहचान लिया। उन्होंने चंद्रगुप्त को अपना शिष्य बनाया, उसे तक्षशिला ले जाकर युद्ध, अर्थशास्त्र और राजनीति की सर्वोच्च शिक्षा दी, और साथ ही जैन धर्म के मूल सिद्धांतों—अहिंसा, अनेकांतवाद (सत्य के बहुआयामी रूप), और कर्म सिद्धांत—के संस्कारों से भी गहराई से सिंचित किया।
3. चंद्रगुप्त का राज्याभिषेक और जैन धर्म को राज्याश्रय
वर्षों के कड़े संघर्ष, चाणक्य की अचूक कूटनीति और चंद्रगुप्त के अदम्य साहस के बल पर अंततः नंद वंश का पतन हुआ। 321 ईसा पूर्व (लगभग) में चंद्रगुप्त मौर्य का पाटलिपुत्र के राजसिंहासन पर राज्याभिषेक हुआ। उन्होंने एक ऐसे विशाल साम्राज्य की स्थापना की, जिसकी सीमाएं पूर्व में बंगाल से लेकर पश्चिम में अफ़ग़ानिस्तान (हिंदुकुश पर्वतों) तक, और उत्तर में कश्मीर से लेकर दक्षिण में दक्कन के पठार तक फैली हुई थीं।
- जैन धर्म का प्रभाव: चक्रवर्ती सम्राट बनने के बाद, चंद्रगुप्त मौर्य ने अपने साम्राज्य में जैन धर्म को भारी प्रश्रय और राज्याश्रय दिया। उनके दरबार में जैन विद्वानों का बड़ा सम्मान था।
- चाणक्य के मार्गदर्शन में राज्य की नीतियां इस प्रकार बनाई गईं कि प्रजा में नैतिकता, शांति और 'जीवदया' (जानवरों के प्रति करुणा) का भाव पनपे। चंद्रगुप्त ने जैन धर्म के सिद्धांतों को अपने व्यक्तिगत जीवन में भी उतारा और वे नियमित रूप से जैन मुनियों के दर्शन और सत्संग का लाभ लेते थे।
4. अंतिम श्रुतकेवली आचार्य भद्रबाहु स्वामी का मगध में आगमन
चंद्रगुप्त मौर्य का शासनकाल अपार शांति, सुशासन और आर्थिक समृद्धि का काल था। इसी दौरान, जैन धर्म के इतिहास की एक अत्यंत महत्वपूर्ण घटना घटी। भगवान महावीर के निर्वाण के लगभग 160 वर्षों के बाद, अंतिम श्रुतकेवली महान श्वेतांबर आचार्य श्री भद्रबाहु स्वामी जी का मगध की राजधानी पाटलिपुत्र में पदार्पण हुआ।
(नोट: 'श्रुतकेवली' उस महान आत्मा को कहा जाता है, जिन्हें भगवान महावीर द्वारा रचित बारह अंगों और चौदह 'पूर्वों' (प्राचीनतम जैन शास्त्र) का संपूर्ण और पूर्ण ज्ञान होता है। भद्रबाहु स्वामी अंतिम ऐसे आचार्य थे जिन्हें यह संपूर्ण ज्ञान कंठस्थ था।)
आचार्य भद्रबाहु स्वामी एक अत्यंत कठोर तपस्वी, त्रिकालदर्शी (तीनों कालों को देखने वाले) और वीतराग संत थे।
- जब सम्राट चंद्रगुप्त मौर्य को यह सूचना मिली कि श्रुतकेवली आचार्य भद्रबाहु उनके नगर में पधारे हैं, तो उनका रोम-रोम भक्ति से खिल उठा।
- कल तक जो सम्राट हाथियों के विशाल झुंड और लाखों की सेना के साथ चलता था, वह अपना राजमुकुट और राजसी जूते उतारकर, नंगे पैर, एक साधारण श्रावक (भक्त) की भांति आचार्य भद्रबाहु स्वामी के दर्शन करने उनके उपाश्रय (निवास स्थान) की ओर चल पड़ा।
- गुरु भगवंत के मुखारविंद से जैन आगमों का वैराग्यपूर्ण उपदेश सुनकर चंद्रगुप्त का हृदय संसार की नश्वरता को समझने लगा। उन्हें यह गहरा अहसास होने लगा कि यह विशाल राजपाठ, यह सोने का मुकुट, यह चतुरंगिणी सेना और यह भौतिक वैभव केवल कुछ समय का नाटक है। आत्मा का असली कल्याण तो वीतराग (मोह-माया से मुक्त) मार्ग में ही छिपा है।
5. चंद्रगुप्त मौर्य के 16 रहस्यमयी स्वप्न और युग परिवर्तन का संकेत
जैन परंपरा, विशेषकर 'परिशिष्टपर्वन' में चंद्रगुप्त मौर्य के वैराग्य का सबसे बड़ा टर्निंग पॉइंट (Turning Point) उनके द्वारा देखे गए 16 अद्भुत और डरावने स्वप्न हैं।
एक रात जब सम्राट चंद्रगुप्त अपने राजमहल में सो रहे थे, तो उन्होंने एक के बाद एक 16 बहुत ही रहस्यमयी सपने देखे। इन सपनों ने सम्राट को भीतर तक बेचैन कर दिया। अगले दिन प्रातःकाल वे अत्यंत व्याकुल होकर आचार्य भद्रबाहु स्वामी के चरणों में पहुँचे और हाथ जोड़कर उन सपनों का अर्थ (फलादेश) पूछा।
श्रुतकेवली आचार्य भद्रबाहु ने अपने दिव्य ज्ञान से उन 16 सपनों का जो फलादेश बताया, उसने न केवल चंद्रगुप्त के जीवन की दिशा बदल दी, बल्कि आने वाले युग (पंचम काल) की एक बहुत ही डरावनी और सटीक तस्वीर भी पेश की। वे प्रमुख स्वप्न और उनके अर्थ इस प्रकार थे:
- 1 ) स्वप्न: डूबता हुआ सूर्य (अस्त होता हुआ सूरज)।
- 2) स्वप्न: कल्पवृक्ष (मनोकामना पूरी करने वाला पेड़) की एक बड़ी डाल टूट कर गिर रही है।
- 3) स्वप्न: आकाश में उड़ने वाला विमान (रथ) वापस धरती पर आ गिरा है।
- 4) स्वप्न: एक स्वर्ण कलश (सोने का घड़ा) कूड़े के ढेर (गोबर) पर रखा हुआ है।
- 5) स्वप्न: हाथी और बंदर एक साथ बैठे हैं, या हाथी पर बंदर सवार हैं।
- 6) स्वप्न: काले-काले बादल आसमान में छाए हैं, गरज रहे हैं, लेकिन बारिश की एक बूंद नहीं गिर रही है।
- 7) स्वप्न: एक कमल का फूल कीचड़ में न खिलकर सूखी जमीन पर खिला है।
- 8) स्वप्न: कुत्ते एक सोने के बर्तन में रखी हुई पवित्र खीर खा रहे हैं।
(इसी प्रकार अन्य स्वप्न भी भविष्य के पतन की ओर इशारा कर रहे थे, लेकिन सबसे अंतिम और सबसे भयानक स्वप्न 16वां स्वप्न था।)
16वां स्वप्न: 12 फन वाला विशाल नाग (सर्प)
16) स्वप्न: चंद्रगुप्त ने बताया कि उन्होंने एक बहुत ही भयंकर नाग देखा है जिसके 12 बड़े-बड़े फन (Hoods) हैं।
फलादेश: आचार्य भद्रबाहु स्वामी गंभीर हो गए और उन्होंने बताया कि यह स्वप्न एक घोर चेतावनी है। इसका अर्थ है कि शीघ्र ही मगध सहित पूरे उत्तर भारत में लगातार 12 वर्षों का एक भयंकर और विनाशकारी अकाल (दुष्काल) पड़ने वाला है। इन 12 सालों में न बारिश होगी, न अन्न उगेगा। लाखों लोग भूख-प्यास से तड़प-तड़प कर मरेंगे और जैन साधुओं के लिए गोचरी (भिक्षा) प्राप्त करके अपना निर्वाह करना भी लगभग असंभव हो जाएगा।
6. 12 वर्षीय भयंकर अकाल की चेतावनी और वैराग्य का उदय
आचार्य भद्रबाहु द्वारा 12 वर्ष के भयंकर अकाल की यह त्रिकालदर्शी भविष्यवाणी सुनकर सम्राट चंद्रगुप्त मौर्य का हृदय भीतर तक कांप उठा। एक चक्रवर्ती सम्राट, जिसने कभी युद्ध के मैदान में हार नहीं मानी थी, जिसने सेल्यूकस जैसे विदेशी आक्रांताओं को धूल चटाई थी, वह प्रकृति और 'कर्म-सत्ता' के आगे स्वयं को नितांत असहाय और छोटा महसूस करने लगा।
सम्राट चंद्रगुप्त महलों में लौट आए, लेकिन उनका मन अब राजकाज में नहीं लग रहा था। वे रात-दिन विचार करने लगे: "जब मैं, एक चक्रवर्ती सम्राट होकर भी, अपनी करोड़ों की प्रजा को इस भयंकर प्राकृतिक आपदा और अकाल से नहीं बचा सकता, तो मेरे इस मुकुट, इन खजानों और इस राजसिंहासन का क्या मोल? जो भौतिक सुख, धन और सत्ता मेरी आत्मा को जन्म-मरण के अनंत चक्र से नहीं बचा सकते, उनका मैं क्या करूँगा?"
वैराग्य (Detachment) की भावना उनके हृदय में पूरी तरह से घर कर गई। चंद्रगुप्त को यह स्पष्ट हो गया कि इस नश्वर शरीर का अंत निश्चित है, और यदि इसे किसी महान कार्य में लगाना है, तो वह केवल 'आत्म-कल्याण' और तपस्या हो सकती है।
7. राजपाठ का सर्वथा त्याग और मुनि दीक्षा
लगभग 298 ईसा पूर्व में, अकाल की शुरुआत के लक्षण दिखाई देने लगे थे। सम्राट चंद्रगुप्त ने अपने जीवन का सबसे बड़ा और सबसे कठिन निर्णय लिया।
- सिंहासन का त्याग: उन्होंने अपने योग्य पुत्र बिंदुसार का राज्याभिषेक कर उसे मगध और पूरे भारतवर्ष का नया सम्राट घोषित कर दिया। उन्होंने अपना राजमुकुट उतार कर बिंदुसार के सिर पर रख दिया।
- दीक्षा का क्षण: जिस शरीर पर रेशमी वस्त्र और विश्व के सबसे कीमती हीरे-जवाहरात हुआ करते थे, चंद्रगुप्त ने उन्हें एक झटके में उतार फेंका। उन्होंने अपने हाथों से अपने केशों का लोंच (Kesh-Lonch) किया।
- एक अकिंचन (जिसके पास कुछ भी न हो) के रूप में, वे आचार्य भद्रबाहु स्वामी के श्रीचरणों में उपस्थित हुए और उनसे 'जैन भागवती दीक्षा' (मुनि धर्म) अंगीकार कर ली।
कल तक जिसे दुनिया 'सम्राट चंद्रगुप्त' कहती थी, वह अब जैन परंपरा के एक श्वेतांबर मुनि और तपस्वी 'मुनि चंद्रगुप्त' बन चुके थे। उनके पास अब न कोई राज्य था, न परिवार, और न ही कोई संपत्ति। उनके पास था तो केवल संयम का उपकरण (रजोहरण/पात्र) और अपनी आत्मा को शुद्ध करने का दृढ़ संकल्प।
8. जैन परंपरा के अनुसार अकाल का समय और मुनि चंद्रगुप्त का कठोर तप
12 वर्षीय अकाल की भविष्यवाणी सच साबित हुई। अकाल के कारण जैन श्रमण संघ (मुनियों के समूह) के लिए उत्तर भारत में रहना और भिक्षा द्वारा जीवन निर्वाह करना अत्यंत कठिन हो गया था।
जैन ग्रंथों के अनुसार संघ का विभाजन: जैन इतिहास और 'परिशिष्टपर्वन' के अनुसार, इस विकट स्थिति में जैन संघ की रक्षा के लिए आचार्य भद्रबाहु स्वामी ने संघ को आदेश दिया कि वे समुद्र तटों की ओर या दक्षिण दिशा की ओर विहार कर जाएं जहां अकाल का प्रभाव कम है।
- स्वयं आचार्य भद्रबाहु स्वामी नेपाल की ओर चले गए, ताकि वहां जाकर वे 'महाप्राण ध्यान' नामक अत्यंत कठिन तपस्या कर सकें। (बाद में पाटलिपुत्र में जैन आगमों को संकलित करने के लिए आचार्य स्थूलभद्र जी भद्रबाहु स्वामी के पास नेपाल गए थे, ताकि उनसे 14 पूर्वों का ज्ञान सीख सकें)।
- दूसरी ओर, विशाल जैन संघ (जिसमें हजारों मुनि शामिल थे) अकाल से बचने के लिए अन्य दिशाओं में (समुद्र तटों और दक्षिण की ओर) निकल गया।
- मुनि चंद्रगुप्त का विहार और वैय्यावच्च: नव-दीक्षित मुनि चंद्रगुप्त भी इसी संघ के साथ हो लिए। कल तक जो सम्राट रथों और पालकियों में चलता था, वह अब जंगलों की पथरीली जमीन पर, कांटों पर नंगे पैर चल रहा था। उन्होंने अपने राजसी अहंकार को पूरी तरह से जलाकर राख कर दिया था। वे संघ के अन्य वृद्ध और बीमार मुनियों की 'वैय्यावच्च' (सेवा) करते थे। वे महीनों तक कठिन उपवास करते और ध्यान में लीन रहते।
उनका यह जीवन इस बात का सबसे बड़ा प्रमाण था कि सच्चा जैन मुनि वह है जो महलों के सुख को तिनके के समान त्याग दे और कांटों पर भी समभाव से चले।
9. अनशन और परम समाधि मरण
जैन धर्म की सबसे बड़ी और अनूठी विशेषता यह है कि यहाँ मृत्यु को कोई शोक का विषय या दुखद अंत नहीं माना जाता। जब मृत्यु निकट हो, तो जैन धर्म में उसे एक 'उत्सव' की तरह अपनाया जाता है, जिसे 'अनशन' कहा जाता है।
मुनि चंद्रगुप्त ने मुनि जीवन में वर्षों तक घोर तपस्या की। जब उन्हें अपने ज्ञान और अंतरात्मा की आवाज़ से यह आभास हो गया कि उनके इस भौतिक शरीर का अंत समय निकट आ गया है और अब यह शरीर तपस्या के योग्य नहीं रहा है, तो उन्होंने मृत्यु का स्वागत करने का निर्णय लिया।
अनशन का संकल्प: मुनि चंद्रगुप्त ने अन्न, जल, और सभी प्रकार के आहार का स्वेच्छा से पूर्ण रूप से त्याग कर दिया। ।
उन्होंने सांसारिक मोह, अपने पूर्व राज्य, राग-द्वेष और राजपाठ की स्मृतियों को अपने मन से पूरी तरह निकाल दिया। उनके मन में बिंदुसार या मगध के प्रति कोई लगाव नहीं बचा था।
चारों आहारों का त्याग कर, वे एक शिला पर स्थिर होकर बैठ गए। ध्यान और आत्म-चिंतन में लीन होकर, पंच परमेष्ठी (णमोकार मंत्र) का स्मरण करते हुए, मुनि चंद्रगुप्त ने अत्यंत शांति और समभाव पूर्वक अपने प्राणों का उत्सर्ग किया।
एक वह दिन था जब उन्होंने तलवार के बल पर सिकंदर के सेनापतियों को खदेड़ा था, और एक यह दिन था जब उन्होंने अपनी 'तपस्या के बल पर अपने जन्म-मरण के कर्मों को खदेड़ दिया।'
निष्कर्ष: सच्ची चक्रवर्ती विजय
भारतीय इतिहास चंद्रगुप्त मौर्य को एक महान 'विजेता' (Conqueror) के रूप में याद रखता है। इतिहास की किताबें उन्हें एक ऐसे नायक के रूप में चित्रित करती हैं जिसने खंडित भारत को एक किया। लेकिन जैन इतिहास और जैन परंपरा उन्हें 'स्वयं को जीतने वाले' यानी 'जिन' के मार्ग पर चलने वाले एक महान वीतराग साधक के रूप में वंदन करती है।
चंद्रगुप्त मौर्य का जीवन पूरी मानवता को यह शाश्वत संदेश देता है कि चाहे आप दुनिया की सारी दौलत, सारा यश और सारी ताकत इकट्ठी कर लें, लेकिन अंततः आत्मा की सच्ची शांति 'अपरिग्रह' (त्याग) और 'वीतरागता' में ही बसती है। जब सत्ता का नशा उतरता है और मृत्यु का सत्य सामने आता है, तब केवल धर्म ही आत्मा का सच्चा साथी होता है।
आधी दुनिया को जीतने के बाद, खुद पर विजय प्राप्त करने वाले जिनशासन के ऐसे महान साधक, चक्रवर्ती सम्राट और तपस्वी मुनिराज चंद्रगुप्त को संपूर्ण जैन समाज का कोटि-कोटि वंदन!
