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Shree Neminath Bhagvan Bhag 3 | श्री नेमीनाथ परमात्मा | JAIN STUTI STAVAN

श्री नेमीनाथ परमात्मा



जब राजीमती को मालूम हुआ कि नेमिनाथ ने दीक्षा ग्रहण कर ली है, तो उसे अत्यन्त आघात पहुँचा।

उसने बहुत विलाप किया,परन्तु उसने सोचा कि इससे कुछ न होगा।

अन्त में उसने अपने स्वामी के अनुगमन करने का दृढ़ निश्चय कर लिया।

नेमिनाथ के भाई रथनेमि को पता चला कि राजीमती भी दीक्षा की तैयारी कर रही है तो वे उसके पास जाकर उसे समझाने लगे - ‘‘भाभी, नेमि तो वीतराग हो गये हैं, अतएव उनकी आशा करना व्यर्थ है। क्यों न तुम मुझसे विवाह कर लो?’’

राजीमती ने कहा, ‘‘मैं नेमिनाथ की अनुगामिनी बनने का दृढ़ संकल्प कर चुकी हूँ, उससे मुझे कोई नहीं डिगा सकता।’’

एक दिन रथनेमि ने फिर वही प्रसंग छेड़ा।

इस पर राजीमती ने उसके सामने खीर खाकर ऊपर से मदनफल खा लिया,

जिससे उसे तुरन्त वमन हो गया। इस वमन को राजीमती ने सोने के एक पात्र में ले उसे अपने देवर के सामने रखकर उसे भक्षण करने को कहा।

उसने उत्तर दिया - भाभी, वमन की हुई वस्तु मैं कैसे खा सकता हूँ?

राजीमती - क्या तुम इतना समझते हो? रथनेमि - यह बात तो एक बालक भी जानता है।

राजीमती - यदि ऐसी बात है तो फिर तुम मेरी कामना क्यों करते हो? मैं भी तो परित्यक्ता हूँ।

 राजीमती ने रैवतक पर्वत पर जाकर भगवान नेमिनाथ के पास दीक्षा ले ली।

कुछ समय बाद रथनेमि ने भी दीक्षा ग्रहण कर ली, और वे साधु होकर उसी पर्वत पर विहार करने लगे।

एक बार की बात है।

राजीमती अन्य साध्वियों के साथ रैवतक पर विहार कर रही थी।

इतने में बड़े जोर की वर्षा होने लगी।

सभी साध्वियाँ पास की गुफाओं में चली गयीं।

 राजीमती भी एक सूनी गुफा में आकर खड़ी हो गयी।

संयोगवश रथनेमि साधु भी उसी गुफा में खड़े होकर तप कर रहे थे।

अँधेरे में राजीमती ने उन्हें नहीं देखा।

वह वर्षा से भीगे हुए वस्त्र उतारकर सुखाने लगी।

राजीमती को इस अवस्था में देखकर रथनेमि के हृदय में फिर से खलबली मच गयी।

उसने राजीमती से प्रेम की याचना की।

परन्तु राजीमती का मन डोलायमान न हुआ।

वह स्वयं संयम में दृढ़ रही और अपने उपदेशों द्वारा उसने रथनेमि को संयम में दृढ़ कर दिया।

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