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सुधर्मराजा की कथा | Sudharmaraja ki katha | सुधर्मराजा की कहानी | sudharamraja ki kahani

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पांचाल देश का सुधर्म नामक राजा जैनधर्म में दृढ़ था। एक बार इतने आकर उससे कहा कि-हे देव ! महाबल नामक चोर लोगों को अत्यन्त कष्ट पहुंचाता है । इस पर राजाने उत्तर दिया कि-मैं स्वयं वहां जाकर इसका निग्रह करुंगा, क्यों कि 

तावद्गर्जन्ति मातंगा, वने मदभरालसाः । 
शिरोविलग्नलाङ्लो, यावन्नायाति केसरी ॥१॥

भावार्थ:-मद में मस्त हुए हाथी वन में तभी तक गर्जन करता हैं जब तक कि-पूछ को मस्तक पर झूलाते हुए केसरीसिंह नहीं आता।  

ऐसा कह कर सैन्य भार से. पृथ्वीतल को नमाते हुए सुधर्म राजा उस चोर का निग्रह करने को गया। क्रीड़ा मात्र से ही चोर का पराभव कर राजा वापस अपने नगर को लौटा तो नगर में प्रवेश करते ही नगर का मुख्य द्वार एकाएक गिर पड़ा । इसे अपशुकन समझ राजा वापस मुड़ गया और ग्राम के बाहर ही पड़ाव किया। मंत्रियोंने शीघ्रतया नया द्वार बनवाया परन्तु वह भी प्रवेशसमय टूट गया। फिर एक ओर द्वार बनवाया गया किन्तु वह भी टूट गया। यह देख कर राजाने मंत्रियों से कहा कि यह दरवाजा बारंवार क्यों टूट जाता है ! मंत्रीने उत्तर दिया कि-हे देव ! यदि आप अपने हाथ से एक पुरुष का वध कर बलिदान करें तो इस दरवाजे का अध्यक्ष यक्षदेव प्रसन्न हो सकता है अन्यथा अन्य प्रकार की पूजा, नैवेद्य या बलिदान से उसका प्रसन्न होना कठिन है । इस प्रकार चार्वाक मतानुयायी मंत्री के वचन सुन कर राजाने कहा कि-जिस नगर में जाने के लिये जीववध करना पड़े उस नगर में जाने से मुझे क्या प्रयोजन ? क्योंकि जिस अलंकार के पहिनने से कान ही टूट गिरे उस अलंकार को पहिनना ही क्यों? राजनीति भी बतलाती है कि

न कर्तव्या स्वयं हिंसा, प्रवृत्तां च निवारयेत् ।
जीवितं बलमारोग्यं, शश्वद्वान्छन्महीपतिः ॥१॥

भावार्थ:-जीवन, बल और आरोग्यता के अभिलाषी राजा को हिंसा कभी नहीं करना चाहिये अपितु होनेवाली हिंसा का भी निवारण करना चाहिये । 

राजा के इस निश्चय को जान कर मंत्रीने समग्र पुरवासीयों को बुला कर कहा कि-" हे पुरवासीयों ! यदि राजा एक मनुष्य का वध कर बलिदान दे तो यह दरवाजा स्थिर रह सकता था अन्यथा नहीं, अतः मैंने जब राजा से ऐसा करने की प्रार्थना की तो उसने उत्तर दिया कि मैं न जीवहिंसा स्वयं करुंगा न कराउंगा और न करने का अनु. मोदन ही करुंगा इसलिये अब तुम जैसा चाहो वैसा करो।" इस पर महाजनोंने राजा से प्रार्थना की कि-हे स्वामी! हम सब कुछ करलेगें परन्तु आप मौन ही रहना । इस पर राजाने कहा कि-प्रजा के किसी भी पाप का छट्ठा हिस्सा राजा के भाग में आता है । कहा भी है कि 

यथैव पुण्यादिसुकर्मभाजां, षष्ठांशभागी नृपतिः सुवृत्तः । 
तथैव पापादिकुकर्मभाजां, षष्ठांशभागी नृपतिः कुवृत्तः ॥१॥ 

भावार्थ:--जिस प्रकार पुण्यादिक सुकर्म करनेवाले मनुष्यों के पुण्य का छट्ठा भाग राजा को मिलता है उसी प्रकार पापादिक कुकर्म करनेवाले मनुष्यों के पाप, का छट्ठा हिस्सा भी राजा को मिलता है । 

महाजनोंने फिर कहा कि हे स्वामी ! इस पाप का सब भाग हमारे सिर पर पड़ेगा इस में आप का कोई भाग नहीं होगा आदि बाते बना कर उन्होंने महाप्रयत्न से राजा को मौन रहना स्वीकार कराया। फिर महाजन लोगोंने अपने घर से द्रव्यं निकाल कर एकत्रित कर स्वर्ण का एक पुरुष बनाया । उसे गाड़ी में रख सारे नगर में फिरा कर यह घोषणा कराई कि-यदि कोई माता अपने पत्र को अपने हाथ से विषपान कराये और उसका पिता उसका गला घोट दे तो उसे यह स्वर्णमय पुरुष तथा एक करोड़ स्वर्णमोहर दी जायगी । उसी नगर में एक महादरिद्री वरदत्त नामक ब्राह्मण रहता था, जिसके रुद्रदत्ता नामक स्त्री थी । वे दोनो अत्यन्त निर्दय थे । उनके सात पुत्र थे । उपरोक्त घोषणा सुन कर वरदत्तने अपनी स्त्री से कहा कि हे प्रिया ! छोटे पुत्र को देकर यह सर्व द्रव्य हम क्यों न लेतें क्योंकि द्रव्य का माहात्म्य लोकोत्तर हैं। कहा भी है कि 

पूज्यते यदपूज्योऽपि, यदगम्योऽपि गम्यते ।
वंद्यते यदवंद्योऽपि तत्प्रभावो धनस्य च ॥ १ ॥ 

भावार्थ:- अपूज्य का पूजा जाना, अगम्य का गमन होना और अवध का वंदित होना यह सर्व धन का ही प्रभाव है ।

 यह सुन कर निर्दयता के कारण उसने भी पति के वचनों को स्वीकार कर लिया । तत्पश्चात् ब्राह्मणने घोषणा · करनेवाले से कहा कि मुझे द्रव्य देकर इस पुत्र को लेजाओ । इस पर लोगोंने कहा कि जब तेरी स्त्री इसको विषपान करावेगी और तू इसका गला घोटेगा तब ही तुझको यह द्रव्य दिया जायगा, अन्यथा नहीं । ब्राह्मणने यह बात स्वीकार की । उस समय अपने माता-पिता के यह वचन सुन कर छोटे बालक इन्ददसने विचार किया कि-अहो ! संसार कैसा स्वार्थी है कि जिस में द्रव्य के लिये माता-पिता अपने पुत्र तक को मारने को तैयार हो जाते हैं। फिर उसने उसको पुष्पादिक से श्रृंगार कर राजा के पास ले गये । राजाने उस बालक को हँसते हुए आते देख पूछा कि-हे बालक ! तू क्यों हँसता है ? क्या तू मृत्यु से नहीं डरता ? इस पर उस बालकने उत्तर दिया कि-है राजा ! 

सुनियेतावद्भयाद्विभेतव्यं, यावद्भयमनागतम् । 
आगतं तु भयं दृष्ट्वा , सोढव्यं तमशकितैः ॥१॥ 

भावार्थ:-जब तक भय प्राप्त न हो तब तक ही भय से भयभीत होना चाहिये परन्तु भय के उपस्थित होने पर तो उसको निशंकरूप से सहन करना चाहिये क्योंकि फिर उससे भय करना निष्फल है। __ अपितु हे राजा! लता के अंकुर से हँसों के सदृश जब शरण करने योग्य से ही भय प्राप्त हो तो फिर भग कर कहा जाना ? इस पर राजाने हँस का वृत्तान्त सुनाने को कहा तो वह बालक बोला कि किसी अरण्य में मानस सरोवर के तीर पर एक सीधा ऊंचा वृक्ष था जिस पर कई हंस निवास करते थे। एक बार उस वृक्ष के मूल में एक लता का अंकुर देख कर वृद्ध हंसने दूसरे हँसो से कहा कि - " हे पुत्र पौत्रो ! इस लता के अंकुर को तुम सब चौचद्वारा काट डालो कि जिससे सब की मृत्यु न हों। " यह सुन कर उन युवान हंसोंने हँसते हुए कहा कि - " अहो ! यह वृद्ध मृत्यु से कितना डरता हैं ? हमेशा जीने की अभिलाषा रखता है । इस अंकुर से हमारा क्या अहित हो सकता है ?" यह जान कर वृद्ध हंसने विचार किया कि- अहो ! ये युवान कैसे मूर्ख हैं कि जो अपने हित अहित की बात भी नहीं जान सकते हैं । कहा भी हैं कि 

प्रायः संप्रति कोपाय, सन्मार्गस्योपदर्शनम् । 
निलूननासिकस्येव, विशुद्धादर्शदर्शनात् ॥ १ ॥ 

भावार्थ:-- आजकल सत्य मार्ग का उपदेश करना बहुधा क्रोध का माजन मात्र है । जैसे नाक कटे पुरुष को निर्मल अरिसा दिखाना केवल उससे झगड़ा मोल लेना है ।  अपितु - 

उपदेशो न दातव्यो, यादृशे तादृशे नरे । 
पश्य वानरमूर्खेण, सुगृही निर्गृही कृता ॥ १॥ 

भावार्थ:- जिस किसी को उपदेश देना व्यर्थ है क्योंकि देखिये इस प्रकार का विना विचार किये उपदेश देने में मूर्ख वानर से सुगृही को घर रहित कर दिया । एक वृक्ष पर एक सुगृही घर बना उस में सुख से रहती थी। एक बार वर्षाऋतु में अत्यन्त वृष्टि होने पर एक वानर इधर उधर घूमता हुआ शीतल वायु से कांपता हुआ और दांतों को कटकटाता वहां जा पहुंचा । उसको अत्यन्त दुःखी देख कर उस सुगृहीने कहा कि-' हे वानर ! ऐसी वर्षाऋतु में इधर उधर क्यों दौड़ता फिरता है ? हमारी तरह घर बना कर क्यों नहीं रहता ?' यह सुन कर वानरने उत्तर दिया कि 

सूचीमुखे! दुराचारे!, रे रे पंडितमानिनि! । 
असमर्थो गृहारंभे, समर्थो गृहभंजने ॥१॥ 

भावार्थ:-सुई मुख के सदृश तीक्ष्ण मुखवाली, दुरा. चारिणी, और पंडितमानी सुगृही ! मैं घर बनाने में तो असमर्थ हूँ परन्तु गृहभंजन में तो समर्थ हूँ। ऐसा कह कर एक फलांग मार कर उस वानरने उसके घरको तहसनहस कर एक एक तृण को भिन्न भिन्न दिशाओं में फेंक दिया। फिर वह सुगृही अन्यत्र जा सुख से रहने लगी। ऐसा विचार वह वृद्ध हँस मौन धारण कर बैठ रहा । समय के व्यतीत होने पर वह लता बढ़ कर वृक्ष के आसपास लिपट चोतरफ फैल गई और अनुक्रम से वृक्ष के सिरे तक पहुंच गई । एक दिन किसी पारधीने आकर उस लता को पकड़ वृक्ष पर चढ़ सब ओर पाश फैला दिया। रात्री के होने पर सब हंस सोने के लिये उस वृक्ष पर आकर बैठे, अतः सब उस पाश में फंस गये और पुकार मचाने लगे तो वृद्ध हंसने कहा कि-तुमने पहले मेरे कहनेनुसार नहीं किया जिससे यह मृत्यु प्राप्त हुई है। वे बोले-हे पिता ! हमने जिस लता के अंकुर को शरण के लिये रक्खा था वह ही आज हमारी मृत्यु का कारण बन गई, अब हमको इस से बचने का उपाय बतलाइयें । कहा भी है कि 

चित्तायत्तं धातुबद्धं शरीरं, नष्टे चित्ते धातवो यान्ति नाशम् । 
तस्माञ्चितं यत्नतो रक्षणीयं, स्वस्थे चित्ते बुद्धयः संभवन्ति ॥१॥ 

भावार्थ:-यह सप्त धातु से बना हुआ शरीर चित्त के आधीन है, चित्त का यत्न से रक्षण करना चाहिये क्योंकि चित्त के स्वस्थ होने से बुद्धि उत्पन्न होती है। ... वृद्ध हंसने कहा कि-हे पुत्रों ! प्रातःकाल तुम सब मरे हुए के सदृश तद्दन स्तब्ध हो जाना, किंचित् मात्र भी हिलना-डुलना मत कि जिससे तुम को मरे हुए जान कर पारधी ऐसे के ऐसे नीचे फैक देगा; अन्यथा तुम्हारे कंठ मरोड़ कर पीछे नीचे डालेगा। सबोंने वृद्ध के कथनानुसार करना स्वीकार किया। प्रातःकाल पारधीने आकर देखा तो सब को मरे हुए जाना, अतः विश्वास से सब को जाल में से निकाल निकाल कर नीचे डाल दिया। सब हंसो के नीचे डाल दिये जाने पर उस वृद्ध हंसने संकेत किया किसब उड़ उड़ कर भग गये और चिरकाल तक जीवित रहे । उस समय वृद्ध हंसने कहा कि 

दीग्घकालं वयं तत्थ, पायवे निरुवहवे । 
मूलाओ उद्विया वल्ली, जायं सरणतो भयम् ॥१॥

भावार्थ:-हम दीर्घकाल तक इस उपद्रव रहित वृक्ष पर रहे किन्तु बाद में इस वृक्ष के मूल में से ही बेल उठी (जिससे हम मृत्यु के भय में आ गिरे) अतः शरणदाता से ही भय उत्पन्न हुआ। इस प्रकार की वार्ता कह कर इन्द्रदत्तने कहा कि-हे राजा ! इस जगत का ऐसा नियम है कि-पिता से डरा हुआ पुत्र माता की शरण में जाता है, माता से उद्वेगित पुत्र पिता की शरण में जाता है, दोनों से डराया हुआ राजा की शरण में जाता है और राजा से भी उद्वेग पाया हुआ महाजनों की शरण में जाता है । 

अब जहां माता स्वयं ही विष देता है, पिता गला घोटता है, राजा ऐसे कार्य में प्रेरणा करता है और महाजन द्रव्य देकर ऐसा कार्य स्वयं कराते हैं तो फिर किस की शरण लेना ? क्योंकि मातापिताने पुत्र को दे दिया, राजा शत्रु बन कर घात करने को उद्यत हो गया, देवता बलिदान के इच्छुक है तो फिर लोग क्या करें ? अतः हे राजा! अब मुझे भय रख कर क्या करना है ? अब तो प्रसमतापूर्वक यमराज का अतिथि होना ही योग्य है। इस प्रकार उस बालक के वचन सुन कर राजाने कहा कि-हे बालक ! मैं तुझे छोड़ता हूँ, तुझ को मारनेवाला मेरा शत्रु होगा, तू सुख से जीवित रह । मुझे इस नगर आदि से कोई प्रयोजन नहीं है। ऐसा कह कर राजाने सम्पूर्ण नगर में अपने सेवको से इसकी घोषणा कराई। इस प्रकार राजा के धैर्य को देख कर शीघ्र ही एक देवने प्रकट हो कर कहा कि-

हे राजा ! शकद्वारा तेरे धैर्य की प्रशंसा सुन कर उस की परीक्षा करने के लिये मैंने इस दरवाजे को तीन बार तोड़ा है परन्तु तेरे धैर्य को देख कर मैं सन्तुष्ट हो गया हूँ। ऐसा कह कर राजा को प्रणाम कर दरवाजे को जैसा का तेसा बना राजा की प्रशंसा करता हुआ वह देव स्वस्थान को लौट गया । सुधर्म राजाने सर्व जनों के आग्रह पर भी हिंसायुक्त वाक्य ग्रहण न कर वैराग्य से चारित्र ग्रहण कर अन्त में मोक्षसुख को प्राप्त किया । 

इत्युपदेशप्रासादे चतुर्थस्तंभे एकोनपंचाशत्तम व्याख्यानम् ॥ ४९ ॥ .

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