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श्रीदत्त केवली - Story of ShreeDaat Kevali | Jain Kathayien | Jain Story In hindi

श्रीदत्त केवली - Story of ShreeDaat Kevali | Jain Story | Jain Story In hindi

श्रीदत्त केवली - Story of ShreeDaat Kevali | Jain Story | Jain Story In hindi



श्रीमंदिर नामक नगर में स्त्रियों का लोभी और कपटी राजा सुरकांत राज करता था। वहीं पर सोमशेठ नामक नगरसेठ था। उसकी पत्नी का नाम सोमश्री और पुत्र का नाम श्रीदत्त था। पुत्रवधू का नाम श्रीमती था।

एक दिन राजा सुरकांत ने बगीचे से सोमश्री को उठा लिया और उसे अपने अंतःपुर (हरम) में रख लिया। सोमशेठ ने अपने पुत्र से कहा और 5.5 लाख रुपए लेकर गुप्त रूप से पत्नी को छुड़ाने चला गया। किंतु राजा ने प्रजा और मंत्रियों की बात भी नहीं मानी।

श्रीमती ने एक कन्या को जन्म दिया। इस पर श्रीदत्त दुःखी हुआ और वह अपने मित्र शंखदत्त के साथ सिँहलद्वीप चला गया। फिर कटाहद्वीप गया और 11 वर्षों में आठ करोड़ की संपत्ति अर्जित की।

हाथियों और माल से भरे जहाजों के साथ लौटते समय उसे एक बहती हुई पेटी दिखी। दोनों ने तय किया कि जो भी होगा, आधा-आधा बाँटेंगे। पेटी खोलने पर एक बेहोश कन्या मिली, जो पानी छिड़कने से होश में आ गई। तब शंखदत्त ने कहा, “मैंने इसे जीवित किया है, इसलिए मैं इससे विवाह करूँगा।” श्रीदत्त ने कहा, “हमने तय किया था कि आधा-आधा बाँटेंगे, तुम धन ले लो, और कन्या मुझे दो।”
इस बात पर विवाद हुआ और मित्रता नष्ट हो गई। श्रीदत्त ने कपट से शंखदत्त को समुद्र में फेंक दिया — यह मित्रद्रोह था।

इसके बाद श्रीदत्त सुवर्णकुल नामक राज्य पहुँचा। वहाँ उसने राजा को बड़े हाथी भेंट किए और व्यापार करने लगा। राजा के पास चामर झलने वाली सुंदर गणिका का नाम सुवर्णरेखा था। वह बिना अर्धलाख की कीमत के बात नहीं करती थी।

श्रीदत्त ने वह धन दिया और पेटी में मिली कन्या और सुवर्णरेखा को साथ लेकर वन में चला गया। वहाँ उसने एक वानर को बहुत सी वानरियों के साथ कामक्रीड़ा करते देखा। उसने कहा, "क्या ये सब उसकी पत्नियाँ हैं?" गणिका ने कहा, "यह उसकी माँ, बहन और पुत्री भी हो सकती हैं।" श्रीदत्त ने ऐसे आचरण की निंदा की। यह सुन वानर ने उत्तर दिया: "तू दूसरों के दोष देखता है, अपने नहीं। तू अपनी माँ और पुत्री को साथ रखकर विकृत कर्म कर रहा है, और तूने अपने मित्र को समुद्र में डाला, फिर तू पापी नहीं तो कौन?" यह सुनकर श्रीदत्त सोच में पड़ गया – क्या यह कन्या मेरी पुत्री है? क्या यह गणिका मेरी माँ है?
गणिका बोली, "तू मूर्ख है, पशु की बात पर संदेह करने लगा, तू स्वयं पशु जैसा है।"

तभी वहाँ एक मुनि आए। श्रीदत्त ने उनसे प्रश्न किया। मुनि ने अवधिज्ञान से सब कुछ बताया:
मुनि ने कहा – “वानर की बात सत्य है। पहले तेरे पिता ने अपनी पत्नी को छुड़ाने के लिए एक पल्लीपति को 5.5 लाख देकर सेना ली और श्रीमंदिर पर चढ़ाई की। उस समय तेरी पत्नी (श्रीमती) पुत्री को लेकर ससुर के पास गई थी। एक दिन साँप ने बच्ची को डस लिया। विष न उतरने पर उसे पेटी में नींबू के पत्तों के साथ रखकर गंगा में प्रवाहित किया गया – वही पेटी तुझे मिली। अतः वह कन्या तेरी पुत्री है।”

अब तेरी माता की बात सुन।

“तेरे पिता जब दरवाज़ा तोड़कर सेना सहित अंदर घुसे, तो शत्रु के बाण से मारे गए। राजा सुरकांत भाग गया। तेरी माँ को सुभट ने पकड़ कर पल्लीपति को सौंपा। वह किसी तरह जंगल चली गई। वहाँ फल खाकर गौरी बनी। व्यापारियों ने उसे पकड़कर सुवर्णकुल बंदरगाह लाया और गणिका बना दिया। उसका नाम सुवर्णरेखा रखा गया। वह तुझे पहचान गई, लेकिन शर्म और लोभ के कारण कुछ नहीं बताया।"

श्रीदत्त ने पूछा: "वह वानर कौन था?" मुनि बोले: “तेरे पिता, जो मृत्यु के बाद व्यंतर (देव) बने और तुझे पापकर्म में डूबा देखकर वानर में अधिष्ठित होकर चेताया। वह राग के कारण अभी भी वानर रूप में है और तेरी माँ को लेकर जाएगा।” इतने में वानर आया और सुवर्णरेखा (तेरी माँ) को पीठ पर बैठाकर ले गया।

गणिका के न आने पर श्रीदत्त से पूछताछ हुई, लेकिन उसने मौन धारण किया। इस पर उसे जेल में डाल दिया गया। उसकी पुत्री और धन पर राजा ने कब्जा कर लिया। जब श्रीदत्त ने सत्य बताया, लोग हँसे और राजा ने उसे मृत्युदंड देने का आदेश दिया। श्रीदत्त सोचता है: "यह सब पापकर्म का फल है।"

उसी समय पुर्व पुण्य से उत्पन्न मुनिचंद्र केवलि नगर के उद्यान में पधारे। राजा सहित सबने वंदना की। जब धर्मदेशना की बात आई तो केवलि ने कहा:
“जो न्याय और धर्म को नहीं समझता, उसे धर्म उपदेश का क्या लाभ?”
राजा ने पूछा – “क्यों?”
केवली बोले – “क्योंकि तूने सत्यवादी श्रीदत्त को मृत्युदंड की आज्ञा दी।”
राजा ने फिर से पूछताछ की, श्रीदत्त ने सब कुछ बताया। उसी समय वानर भी सुवर्णरेखा को वापस ले आया। सभा चकित रह गई। केवलि ने सभी संदेह दूर कर दिए।

तब श्रीदत्त ने केवलि से पूछा: “मुझे अपनी माँ और पुत्री से राग (आसक्ति) क्यों हुआ?”
केवली ने पूर्वजन्म की कथा बताई:

पूर्व जन्म की कथा:

कंपीलपुर नगर में अग्निशर्मा नामक ब्राह्मण का पुत्र चैत्र था। उसकी दो पत्नियाँ – गौरी और गंगा – थीं। एक बार वह अपने मित्र मैत्र के साथ विदेश गया। लौटते समय उसने मित्र को सोता देख, लोभवश उसे मारने का विचार किया – पर रुका। दोनों की मृत्यु बाद दुर्गति में अनेक योनियों में जन्म लिया। फिर वही श्रीदत्त और शंखदत्त बने।
पूर्व जन्म में मैत्र (अब शंखदत्त) को मारने का विचार किया था, इसलिए इस जन्म में श्रीदत्त ने उसे समुद्र में फेंका।
गौरी और गंगा पुनर्जन्म में उसकी पत्नी बनीं और तपस्या की। एक दिन गौरी ने प्यास लगने पर सोई हुई दासी को डाँटा: "क्या तुझे साँप ने काट लिया?" – इससे उसने पापकर्म बाँधा। गंगा को एक दिन काम करना पड़ा और बाद में उसने दासी को कारागार में डलवा दिया – उससे भी पापकर्म बाँधा। एक बार गंगा ने एक गणिका को विलास करते देखा और उसकी प्रशंसा की – उससे भी अशुभ कर्म बाँध गया।

इन कर्मों के फलस्वरूप गौरी उसकी पुत्री और गंगा उसकी माँ बन गईं। और पूर्व जन्म के प्रेमवश, इस जन्म में उन पर राग उत्पन्न हुआ।

श्रीदत्त ने कहा – “अब मेरा उद्धार करे। यह कन्या किसे दूँ?”
केवली बोले – “शंखदत्त को देना।”

उसी समय शंखदत्त वहाँ आया, श्रीदत्त को मारने दौड़ा, पर राजा को देखकर रुक गया। केवली ने सब समझाया, शांति हुई। श्रीदत्त ने क्षमा माँगी और अपनी कन्या का विवाह शंखदत्त से किया। उसे धन देकर, बाकी धन धर्म के सात क्षेत्र में खर्च किया, दीक्षा ली, चारित्र का पालन किया, केवलज्ञान प्राप्त कर मोक्ष को प्राप्त हुए।

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