इतिहास के पन्नों से: वो राजा जिन्होंने जैन धर्म को राजधर्म बनाया - Jain Stuti Stavan

इतिहास के पन्नों से: वो राजा जिन्होंने जैन धर्म को राजधर्म बनाया


इतिहास के पन्नों से: वो राजा जिन्होंने जैन धर्म को राजधर्म बनाया


जय जिनेन्द्र! वीतराग परमात्मा और गुरु भगवंतों के श्री चरणों में भावपूर्ण वंदन।

एक जैन होने के नाते, जब हम अपने गौरवशाली इतिहास, आगमों और 'जिनशासन' की तरफ मुड़कर देखते हैं, तो हमारा सीना गर्व और भक्ति से भर जाता है। भारतीय इतिहास केवल उन राजाओं की गाथा नहीं है जिन्होंने तलवार के बल पर दुनिया जीती, बल्कि यह उन महान सम्राटों का भी इतिहास है, जिन्होंने श्वेतांबर जैन आचार्यों का सान्निध्य पाकर अपनी तलवारें म्यान में रख दीं और 'अहिंसा' का मार्ग चुना। हमारे गुरु भगवंतों की तपस्या, वैराग्य और प्रखर ज्ञान में वह शक्ति थी, जिसने क्रूर से क्रूर शासकों के हृदय को मोम की तरह पिघला दिया।

जब-जब सत्ता और जिनशासन का मिलन हुआ, तब-तब उस राज्य में जैन धर्म ने 'राजधर्म' (State Religion) का रूप ले लिया। वहां जीवों को अभयदान मिला, भव्य जिनालयों का निर्माण हुआ और जैन धर्म का डंका पूरे विश्व में बजा। आइए, जैन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों के उन सुनहरे पन्नों को विस्तार से पलटें और जानें उन महान सम्राटों के बारे में, जिन पर श्वेतांबर जैन आचार्यों का गहरा प्रभाव पड़ा और जिन्होंने जैन धर्म को शाही संरक्षण (Royal Patronage) प्रदान किया:

1. मगध नरेश महाराजा श्रेणिक (बिंबिसार): तीर्थंकर परमात्मा के परम भक्त

प्राचीन भारतीय इतिहास में मगध साम्राज्य सबसे शक्तिशाली माना जाता था। मगध के राजा श्रेणिक (इतिहास में जिन्हें बिंबिसार कहा जाता है), भगवान महावीर स्वामी के समकालीन थे। श्वेतांबर आगमों (जैसे औपपातिक सूत्र) में राजा श्रेणिक का अत्यंत विस्तार से वर्णन मिलता है।

  • भगवान महावीर के समवसरण में प्रवेश: राजा श्रेणिक शुरुआत में जैन धर्म के अनुयायी नहीं थे, लेकिन जब भगवान महावीर स्वामी का मगध में आगमन हुआ और उनका 'समवसरण' (दिव्य धर्मसभा) रचा गया, तो राजा श्रेणिक नंगे पैर चलकर परमात्मा के दर्शन करने पहुंचे।
  • सम्यक्त्व की प्राप्ति: भगवान महावीर की दिव्य ध्वनि और उनके प्रश्नों के सटीक उत्तर सुनकर राजा श्रेणिक का मिथ्यात्व दूर हो गया और उन्हें 'सम्यक्त्व' (सच्ची दृष्टि) की प्राप्ति हुई।
  • भविष्य के तीर्थंकर: राजा श्रेणिक ने जिनशासन की इतनी उत्कृष्ट सेवा और भक्ति की, कि उन्होंने 'तीर्थंकर नामकर्म' का उपार्जन कर लिया। जैन मान्यताओं के अनुसार, आने वाली अगली चौबीसी (Next 24 Tirthankaras) में राजा श्रेणिक पहले तीर्थंकर 'भगवान महापद्म' के रूप में जन्म लेंगे। उन्होंने मगध राज्य में भगवान महावीर के सिद्धांतों को पूर्ण रूप से लागू किया था।

2. महाराजा संप्रति: जैन धर्म के 'अशोक'

मौर्य वंश के सम्राट अशोक के पौत्र (पोते), महाराजा संप्रति का नाम श्वेतांबर जैन इतिहास में सबसे ऊंचे और आदरणीय स्थानों पर आता है। जैसे अशोक ने बौद्ध धर्म का प्रचार किया, वैसे ही महाराजा संप्रति ने जैन धर्म को पूरे भारत और उसके बाहर फैलाया।

  • पूर्व जन्म का संबंध और आचार्य सुहस्ती सूरी जी: उज्जैन नगरी में महाराजा संप्रति अपने महल की बालकनी में खड़े थे, तभी वहां से महान श्वेतांबर आचार्य आर्य सुहस्ती सूरी जी विहार करते हुए निकले। उन्हें देखते ही महाराजा संप्रति को 'जातिस्मरण ज्ञान' (पूर्व जन्म की याद) हो गया कि पिछले जन्म में वे एक गरीब भिखारी थे और आचार्य भगवंत के उपदेश से उन्होंने जैन धर्म स्वीकार किया था।
  • जिनशासन की महान सेवा: गुरु का सान्निध्य पाकर संप्रति ने जैन धर्म को संपूर्ण मौर्य साम्राज्य का राजधर्म बना दिया। श्वेतांबर ग्रंथों के अनुसार, उन्होंने सवा लाख (1,25,000) नए जिनालयों (जैन मंदिरों) का निर्माण करवाया और करोड़ों जिन प्रतिमाओं की प्राण-प्रतिष्ठा करवाई। आज भी राजस्थान, गुजरात और मध्य प्रदेश में खुदाई में संप्रति राजा के काल की मूर्तियां मिलती हैं।
  • अनार्य देशों में धर्म प्रचार: उन्होंने अपने सैनिकों को जैन साधुओं के भेष में दक्षिण भारत और अरब देशों (अनार्य भूमि) में भेजा, ताकि वहां के लोग जैन साधुओं के रहन-सहन से परिचित हो सकें। इसके बाद उन्होंने वहां असली जैन मुनियों को विहार करने की सुविधा प्रदान की, ताकि पूरे विश्व में अहिंसा का संदेश पहुँच सके।

3. वनराज चावड़ा: पाटण नगरी के संस्थापक और जैन धर्म के रक्षक

8वीं शताब्दी में गुजरात के इतिहास में चावड़ा वंश के संस्थापक राजा वनराज चावड़ा का नाम बहुत प्रसिद्ध है। उनके जीवन और राज्य की नींव में जैन धर्म का सीधा हाथ था।

  • आचार्य शीलगुण सूरी जी का आशीर्वाद: जब वनराज चावड़ा बचपन में अपने परिवार के छिन जाने के बाद जंगलों में भटक रहे थे, तब महान श्वेतांबर आचार्य शीलगुण सूरी जी ने इस बालक में भविष्य के महान चक्रवर्ती राजा के लक्षण देखे। उन्होंने ही वनराज का मार्गदर्शन किया और उन्हें धर्म का मार्ग दिखाया।
  • पाटण (अणहिलवाड़) की स्थापना: जब वनराज ने अपना साम्राज्य वापस जीता और 746 ईस्वी में 'पाटण' (अणहिलवाड़) नगरी की स्थापना की, तो उन्होंने इसे एक जैन केंद्र के रूप में विकसित किया।
  • पंचसरा पार्श्वनाथ का निर्माण: राजा वनराज ने अपने गुरु शीलगुण सूरी जी के सम्मान में पाटण में एक भव्य 'पंचसरा पार्श्वनाथ देरासर' का निर्माण करवाया। उन्होंने जैन धर्म को गुजरात के राज दरबार में सर्वोपरि स्थान दिया, जिसके बाद पाटण कई शताब्दियों तक श्वेतांबर जैन धर्म का सबसे बड़ा गढ़ बना रहा।

4. कन्नौज नरेश महाराजा आम (आमराज) और आचार्य बप्पभट्टि सूरी जी

8वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में, उत्तर भारत में ग्वालियर और कन्नौज पर राजा यशोवर्मन के पुत्र महाराजा आम (Ama) का शासन था।

  • आचार्य बप्पभट्टि सूरी जी का प्रभाव: महाराजा आम के दरबार में महान श्वेतांबर आचार्य बप्पभट्टि सूरी जी का बहुत बड़ा प्रभाव था। आचार्य श्री अपनी विद्वता, तार्किक शक्ति और काव्य रचनाओं के लिए पूरे भारत में विख्यात थे।
  • राजधर्म का दर्जा: राजा आम ने गुरु बप्पभट्टि सूरी के प्रभाव में आकर जैन धर्म स्वीकार कर लिया था। उन्होंने अपने राज्य में शिकार पर प्रतिबंध लगाया और कई जैन मंदिरों का निर्माण करवाया। उनके शासनकाल में जैन दर्शन ने बौद्ध और वैदिक विद्वानों के साथ हुए बड़े शास्त्रार्थों में विजय प्राप्त की थी, जिससे उत्तर भारत में जैन धर्म को भारी शाही संरक्षण मिला।

5. महाराजा कुमारपाल: जिन्होंने 'अहिंसा' को बनाया कानून (अमारी उद्घोषणा)

12वीं शताब्दी में गुजरात के चालुक्य (सोलंकी) वंशीय महाराजा कुमारपाल का शासनकाल श्वेतांबर जैन परंपरा का 'स्वर्ण युग' (Golden Era) माना जाता है। उन्होंने जैन धर्म को जिस ऊंचाई पर पहुंचाया, वह इतिहास में अद्वितीय है।

  • कलिकालसर्वज्ञ आचार्य हेमचंद्र सूरी जी का प्रभाव: महाराजा कुमारपाल महान श्वेतांबर आचार्य 'कलिकालसर्वज्ञ' हेमचंद्र सूरी जी के परम भक्त और शिष्य बन गए। गुरु के मार्गदर्शन में उन्होंने अपने पूरे जीवन और साम्राज्य की व्यवस्था को जैन आगमों के अनुसार ढाल लिया।
  • 'अमारी' (Ahmari) की ऐतिहासिक घोषणा: महाराजा कुमारपाल ने अपने विशाल साम्राज्य (जिसमें गुजरात, राजस्थान, मालवा और महाराष्ट्र के कुछ हिस्से शामिल थे) में 'अमारी उद्घोषणा' लागू कर दी। इसका अर्थ था कि उनके राज्य में किसी भी छोटे या बड़े जीव की हत्या करना कानूनी अपराध था।
  • सख्त नियम: उन्होंने शिकार, मांसाहार, मदिरापान, द्यूत (जुआ) और पशु-बलि पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया। यहां तक कि खटमल और जूं मारने पर भी रोक थी।
  • मंदिरों का निर्माण: कुमारपाल ने अपने गुरु के आदेश पर 1440 भव्य जैन मंदिरों का निर्माण करवाया। गुजरात के तारंगा हिल पर स्थित भगवान अजितनाथ जी का विशाल देरासर और गिरनार पर्वत पर बने मंदिर आज भी महाराजा कुमारपाल की जैन धर्म के प्रति भक्ति की गवाही देते हैं।

6. सम्राट अकबर: जब मुग़ल दरबार में गूंजा श्वेतांबर संतों का ज्ञान

अकबर मुग़ल वंश का एक कट्टर बादशाह था, लेकिन श्वेतांबर तपागच्छ परंपरा के गुरुओं ने अपने वैराग्य और ज्ञान से इस क्रूर शासक का भी हृदय परिवर्तन कर दिया और उसे 'अहिंसा' का मार्ग दिखाया।

  • आचार्य हीरविजय सूरी जी: गुजरात के महान श्वेतांबर संत आचार्य हीरविजय सूरी जी को जब अकबर ने इबादत खाना (फ़तेहपुर सीकरी) में आमंत्रित किया, तो वे किसी भी शाही सवारी का त्याग कर, नंगे पैर पैदल विहार करके आगरा पहुंचे। उनके इस घोर त्याग को देखकर दुनिया को जीतने वाला अकबर उनके चरणों में नतमस्तक हो गया। अकबर ने उन्हें 'जगतगुरु' (World Teacher) की उपाधि दी।
  • पर्युषण पर्व पर ऐतिहासिक फरमान: गुरु भगवंत के उपदेशों का यह असर हुआ कि अकबर ने हमारे महापर्व 'पर्युषण' (Paryushan) के दौरान पूरे मुग़ल साम्राज्य में कई दिनों तक जीव हत्या (Animal Slaughter) पर सख्त रोक लगा दी। एक मुग़ल शासक द्वारा अपनी पूरी प्रजा पर अहिंसा का नियम लागू करना इतिहास की सबसे बड़ी घटनाओं में से एक है।
  • महातीर्थों की रक्षा: अकबर ने एक शाही फरमान जारी कर श्वेतांबर जैनियों के सबसे बड़े तीर्थ शत्रुंजय (पालीताना), गिरनार जी और माउंट आबू से सभी प्रकार के टैक्स (जज़िया) हटा दिए और इन तीर्थों को जैन समुदाय को सौंप दिया।
  • आचार्य जिनचंद्र सूरी जी (खरतरगच्छ): इसके बाद श्वेतांबर खरतरगच्छ परंपरा के आचार्य जिनचंद्र सूरी जी भी मुग़ल दरबार में पधारे। उन्होंने लाहौर में अकबर को उपदेश दिया, जिसके बाद अकबर ने खंभात की खाड़ी में मछली पकड़ने पर पाबंदी लगा दी। अकबर ने उन्हें 'युग प्रधान' की उपाधि से सम्मानित किया था।

7. सम्राट खारवेल: कलिंग के महाप्रतापी जैन रक्षक

प्रथम शताब्दी ईसा पूर्व में कलिंग (वर्तमान उड़ीसा) के महामेघवाहन वंश के सम्राट खारवेल जन्म से ही जैन थे और उन्होंने अपने बाहुबल से जैन धर्म की पताका फहराई।

  • हाथीगुम्फा शिलालेख: उदयगिरि की गुफाओं में मिला 'हाथीगुम्फा शिलालेख' (Hathigumpha Inscription) इस बात का सबसे बड़ा ऐतिहासिक प्रमाण है कि खारवेल ने जैन धर्म को कलिंग का राजधर्म बनाया हुआ था। इस अभिलेख की शुरुआत "नमो अरिहंतानं, नमो सवसिधानं" (जैन नवकार मंत्र) से होती है।
  • कलिंग जिन की वापसी: जब मगध का राजा नंद कलिंग से प्रथम तीर्थंकर परमात्मा श्री ऋषभदेव (आदिनाथ) की प्राचीन और पवित्र 'अग्र जिन' प्रतिमा लूट ले गया था, तब सम्राट खारवेल ने मगध पर भयंकर आक्रमण किया। उन्होंने उस प्रतिमा को ससम्मान वापस कलिंग लाकर स्थापित किया।
  • गुफाओं का निर्माण: सम्राट खारवेल ने जैन श्रमणों और मुनियों के कठोर तप और निवास के लिए उदयगिरि और खंडगिरि की पहाड़ियों में 100 से अधिक भव्य गुफाओं का निर्माण करवाया।

निष्कर्ष: सत्ता से वैराग्य तक का सफर

इतिहास के ये पन्ने इस बात के ज्वलंत प्रमाण हैं कि हम श्वेतांबर जैनियों की विरासत केवल कुछ मंदिरों या ग्रंथों तक सीमित नहीं है। हमारा इतिहास उन सम्राटों का इतिहास है, जिन्होंने यह महसूस किया कि सबसे बड़ी जीत दूसरों की जमीनों पर कब्ज़ा करना नहीं, बल्कि अपनी इंद्रियों और इच्छाओं पर विजय पाना है।

चाहे वह मौर्य काल का संप्रति राजा हो, सोलंकी काल के कुमारपाल हों, या मुग़ल काल का अकबर—इन सभी ने श्वेतांबर जैन आचार्यों के श्रीचरणों में बैठकर यह सीखा कि सच्ची सत्ता और शक्ति हथियारों में नहीं, बल्कि 'करुणा, जीवदया और अहिंसा' में बसती है। इन शासकों ने जैन धर्म को केवल अपनाया ही नहीं, बल्कि इसे राज्य की नीतियों में शामिल करके एक शांतिप्रिय और दयालु समाज की नींव रखी।

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