सद्दालपुत्र की कथा - भगवान महावीर के श्रावक : The story of Saddalputra: Jain Katha

सद्दालपुत्र की कथा - भगवान महावीर के श्रावक : Jain Katha 

सद्दालपुत्र की कथा - भगवान महावीर के श्रावक : Jain Katha


पोल्लासपुर नगर में मंखलीपुत्र (गोशाला) का मतानुयायी सद्दालपुत्र नामक श्रावक रहता था। वह पांचसो कुम्हार की दुकानों का स्वामी था। उसके पास तीन करोड़ स्वर्ण मोहर था और दस हजार गायों का पोषक था। उसकी पत्नी का नाम अग्निमित्रा था। एक बार एक देवने आकाश में अदृश रह कर उसको कहा कि-" हे श्रेष्ठी! कल इस नगर में महामाहन अरिहंत सर्वज्ञ का पधारना होगा जिन की तू कल्याणकारक एवं मंगलकारक देवस्वरूप समझ कर सेवा करना ।" ऐसा कह कर वह देव चला गया तब उसने विचार किया किm सचमुच मेरा धर्मगुरु गोशाल ही महामाहन एवं सर्वज्ञ है अतः जब वह कल आयगा तो मैं उसकी अशनादिकद्वारा सेवा करुंगा।दूसरे दिन प्रातःकाल को गोशाल के स्थान पर श्रीमहावीरस्वामी का आगमन सुन कर वह अत्यन्त हर्षित हुआ और महोत्सवपूर्वक उनको वन्दना करने निमित्त गया। दूर से ही प्रातिहार्यादिक की शोभा को देख कर ऐसा विचार कर कि-अहो ! मेरे गुरु की शक्ति अचिंत्य है। वह प्रभु के समीप पहुंच उनको वन्दना कर बैठ रहा और प्रभु की देशना को श्रवण किया। फिर प्रभुने पूछा कि-

"हे सद्दालपुत्र ! कल देवताने तुझे जो बात कही क्या उसका तुझे स्मरण है ?" उसने "हो" कह कर विनंति की कि-हे प्रभु ! आप मेरी कुम्हार की दुकान पर पधारिये कि-जिससे मैं आप की सेवा कर सकूँ । इस पर प्रभु वहां पधारे । मिट्टी के बर्तनों को धूप में पड़े हुए देख कर जिनेश्वरने उससे प्रश्न किया कि-हे श्रेष्ठी ! इन बर्तनों को किस उपाय से निर्माण किया ? उसने उत्तर दिया कि-हे स्वामी! मिट्टी का पिंड बना उसे चक्र पर चढ़ा कर ये बर्तन बनाये हैं ।

प्रभुने फिर प्रश्न किया कि-हे भद्र ! तू इन बर्तनों को उद्यमद्वारा बनाता है या बिना उद्यम ? इस प्रकार भगवान के प्रश्न करने पर उसके गोशाल के मतानुयायी नियतिवादी होने से यदि उद्योग से बनते हैं ऐसा उत्तर दे तो उसके मतकी क्षति और विपक्षी के मत का प्रतिपादन होता था अतः उसने उत्तर दिया कि-बिना उद्योग के बनते हैं। प्रभुने पूछा कि-हे सद्दालपुत्र ! कदाच कोई पुरुष तेरे इन बर्तनों को चुरा कर ले जाय अथवा तोड़ डाले अथवा तेरी स्त्री के साथ भोगविलास करे तो तू उसको क्या दंड देगा ? 

उसने उत्तर दिया कि-हे भगवान् ! मैं उसकी अत्यन्त तर्जना करूं-उसके प्राण अकाल में ही नाश करातूं। इस पर स्वामीने कहा कि-इस प्रकार उद्यम की परतंत्रता से ही सर्व कार्य करने पर भी तेरा सर्व कार्य उद्यम बिना होना कहना मिथ्या है । एकान्तरूप से माना हुआ सर्व असत्य और स्याद्वादद्वारा माना हुआ ही सत्य होता है। आदि भगवान् की युक्ति से प्रबोध प्राप्त कर उस श्रेष्ठीने अपनी स्त्री सहित जिनेश्वर के पास पांच अणुव्रत और सात शिक्षाव्ररूप श्राद्धधर्म स्वीकार किया। तत्पश्चात् श्रीजिनेश्वरने अन्यत्र विहार किया । 

 सद्दालपुत्र के भगवंत के धर्म को अंगीकार कर लेने की बात सुन कर गोशाल उसके घर पहुंचा परन्तु सदालपुत्र उसको देख कर मौन धारण कर बैठ रहा, खड़े होकर उसका सत्कार तक नहीं किया। उस समय मंखलीपुत्रने लजित होकर भगवान के गुणों का इस प्रकार वर्णन किया कि-हे देवानुप्रिय ! क्या यहां महामाहन का पधारना हुआ था ? सद्दालपुत्रने प्रश्न किया कि-तुम महामाहन किसे कहते हो?

गोशालने उत्तर दिया कि-हे सद्दालपुत्र ! सूक्ष्म और बादर दोनों प्रकार के जीवों की हिंसा से मुक्त होने से श्रीमहावीर ही महामाहन है । हे श्रमणोपासक ! क्या यहां महागोप, महासार्थवाह, महाधर्मकथक और महानिर्यामक पधारे थे ? यह सुन कर श्रेष्ठीने पूछा कि-तुम इस प्रकार किसका वर्णन कर रहे हो ? गोशालने उत्तर दिया कि-मैं त्रिशलापुत्र श्रीमहावीरस्वामी का वर्णन कर रहा हूँ। यह सुन कर श्रेष्ठीने हर्षित हो बहुमानपूर्वक गोशाल से कहा कि-क्या तुम मेरे गुरु के साथ वाद कर सकते हो ? 

गोशालने उत्तर दिया कि-हे भद्र ! मैं तेरे गुरु के साथ वाद करने में असमर्थ हूँ क्योंकि वे तो एक ही वचन से मुझे परास्त कर सकते हैं । यह सुन कर सद्दालपुत्रने कहा कि-तुमने उन सर्वज्ञ का यथार्थ वर्णन किया है, अतः मैं सत्कारपूर्वक तुम को अशन, वस्त्र आदि प्रदान करता हूँ परन्तु धर्मबुद्धि से नहीं। इस प्रकार अनेक युक्तियुक्त वाक्यों द्वारा उसको प्रभु के धर्म में दृढ़ जान कर गोशालने विलक्ष हो वहां से अन्यत्र विहार किया। एक बार एकनिष्ठ सद्दालपुत्र श्राद्धधर्म प्राप्त कर पन्द्रहवें वर्ष में पौषध लेकर पौषधशाला में था कि-रात्री के समय कोई देव हाथ में तीक्ष्ण खड्ग ले पिशाच का रूप धारण कर वहां आकर उपसर्ग करने लगा। उसके घर से उसके एक पुत्र को लाकर शस्त्रद्वारा उसके टुकड़े टुकड़े कर उसके रुधिर को पौषधशाला में बैठे हुए उस श्रेष्ठी के शरीर पर सिंचन करने लगा। फिर भी उस श्रेष्ठी को न तो कुछ भय ही उत्पन्न हुआ न उसके ऊपर क्रोध ही आया । यह देख कर उस पिशाचने कहा कि-हे मृत्यु की प्रार्थना करनेवाले! यदि तू अब भी धर्म का त्याग नहीं करेगा तो भी मैं तेरे समक्ष तेरी स्त्री का ही घात करूंगा । 

इस प्रकार उसके बारबार कहने पर श्रेष्ठीने विचार किया कि-सचमुच यह कोई अनार्य (पापी) जान पड़ता है, अतः मैं इसको पकड़लूं। ऐसा विचार कर जोर से चिल्ला कर वह ज्योंहि उसको पकड़ने जाता है कि-वह देव अदृश्य होजाता है । उस समय अपने पति के चिल्लाने के शब्द सुन कर उसकी स्त्री शीघ्र ही पौषधशाला में दौड़ी हुई आई और पति से चिल्लाने का कारण पूछा जिस पर उसने यथार्थ वृत्तान्त कहा वह सुन कर वह बोली कि-हे स्वामी ! तुम्हारे पुत्र आदि सर्व कुटुम्ब को किसीने नहीं मारा, वे तो सब अपने घर में सुखपूर्वक सोये हुए हैं, अतः यह किसी देवताद्वारा किया हुआ उपसर्ग जान पड़ता है परन्तु तुमने जो अपने व्रत का भंग किया यह अयोग्य है, अतः उस पाप की आलोयणा कीजिये । यह सुन कर श्रेष्ठीने लगे हुए दोष की आलोयणा प्रतिक्रमण किया। अनुक्रम से श्रावक की ग्यारह प्रतिमा का वहन कर वह सौधर्म देवलोक में चार पल्योपम के आयुष्यवाला देवता हुआ । वहां से चव कर महाविदेह क्षेत्र में उत्पन्न हो सिद्धिपद को प्राप्त करेगा। (यह कथा उपासकदशांग से उद्धृत की गई है।)

सद्दालपुत्रने श्रीजिनेश्वर के वाक्यों से बोध प्राप्त कर गोशाला के पक्ष का त्याग कर सम्यक्त्व की यतनाओं को धारण कर स्वर्ग को प्राप्त किया है। इत्युपदेशप्रासादे चतुर्थस्तंभे सप्तचत्वारिंशत्तम व्याख्यानम् ॥४७॥

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