संग्रामसूर राजा
पद्मिनीखंड नामक नगर में संग्रामदृढ़ राजा को संग्रामसूर नामक पुत्र था। वह सदैव शिकार कर अनेक प्राणियों का वध किया करता था। उसके पिता ने उसको बहुत बार समझाया बुझाया किन्तु उसने अपना कदाग्रह नहीं छोड़ा तो पिता ने उसका तिरस्कार कर अपने नगर से बाहर निकाल दिया। वह ग्राम के बाहर एक गांव बसा कर रहने लगा। वहाँ वह सदैव कुत्तों को साथ ले वन में जा अनेक प्राणियों का वध कर प्राणवृत्ति करने लगा। एक बार वह कुत्तों को वहीं छोड़ किसी ग्राम को गया। उस समय उस उद्यान में किसी सूरि महाराज का पधारना हुआ। उन्होंने उन कुत्तों को प्रतिबोध करने के लिये मधुर वचनों से कहा कि-
जो महापापी प्राणि क्षणमात्र के सुख के लिये दूसरे प्राणियों का वध करते हैं वे मानों रक्षा (राख) के लिये हरिचंदन वृक्षों के वन को जलाते हैं।
इस प्रकार सुन कर कुत्तों ने प्रबोध हो जाने से आजन्म प्राणीवध नहीं करने का नियम ग्रहण किया। संग्रामसूर जब ग्राम से वापस अपने घर को लौटा और कुत्तों को प्राणीवध के लिये छोड़ा परन्तु जब वे कुत्ते बिलकुल आगे न बढ़ चित्र में चित्रित से स्तब्ध होकर खड़े रहे तो उसने उनके रक्षकों से इसका कारण पूछा। रक्षकों ने उत्तर दिया कि हे स्वामी ! हम विशेष कुछ नहीं जानते परन्तु इनकी चेष्टा से ऐसा जान पड़ता है कि-यहाँ जो एक साधु आया था उनके वचनों से इनको प्रतिबोध हो गया है।" यह सुन कर संग्रामसूर विचार करने लगा कि "अहो ! मुझे धिक्कार है कि मैं पशु से भी गया बीता हूँ" ऐसा विचार कर वह गुरु के समीप गया, जहाँ उसने धर्म श्रवण किया कि -
अठारह दोषों से रहित जिनेश्वर भगवान को ही देव, पत्थर और कांचन में समान बुद्धि रखनेवाले सुसाधु को ही गुरु और जीव दया आदि से युक्त सुन्दर धर्म को ही धर्म समझ कर इन रत्नत्रय का सदैव सेवन करना चाहिये ।
यह सुन कर संग्राम सूरने श्रावक धर्म अंगीकार किया और राजा को यह बात ज्ञात होने पर उसने उसको वापस नगर में बुला कर युवराज पद प्रदान किया ।
इधर कुमार का परम मित्र मतिसागर चिरकाल से द्रव्य उपार्जन करने के निमित्त समुद्र पार गया था। वह जब बहुत सा धन उपार्जन कर वापस लौटा तो अपने मित्र राजकुमार से मिलने गया। उससे कुमार ने कुशल वार्ता पूछ कर द्वीप समुद्र आदि में जो आश्चर्यदायक बात देखी हो उसका वर्णन करने को कहा तो मतिसागरने उत्तर दिया कि- "हे मित्र ! मैं जहाज में बैठ कर जब समुद्र में जा रहा था तो मैंने भरतखंड की मर्यादा में एक ऊँचे कल्पवृक्ष की शाखा पर झूला डाल कर झूलेरूप पर्यंक पर झूलती हुई एक सुन्दर स्त्री को देखा। वह स्त्री समग्र स्त्रियों की तिलकरूप थी। उसके संगीत शब्द से तो मानो उसने किंनरी एवं देवांगनाओं को भी किंकर (दासी) रूप बना दिया था । ऐसी रूप एवं लावण्यवती स्त्री को देख कर कौतुक से मैंने मेरा जहाज उसकी ओर खैचा परन्तु मैं उसके पास पहुँचा इतने में तो वह मेरे मनोरथ के साथ ही साथ कल्पवृक्ष सहित समुद्र में निमग्न हो गई। वह आश्चर्य केवल तुम्हारे सामने प्रकट किया है।"
यह सुन कर कामदेव के बाण से जर्जरित अंगवाला वह राजकुमार शीघ्र ही अपने मित्र को साथ ले एक जहाज पर सवार होकर जब समुद्र के उस भाग में गया तो उसने भी दूर से उसी प्रकार क्रीड़ा करती हुई स्त्री देखी परन्तु कुमार ज्योंही उसके समीप पहुँचा कि वह स्त्री प्रथम के अनुसार समुद्र में गिर कर अदृश हो गई। यह देख कर उस साहसिक राजकुमारने हाथ में नंगी तलवार लेकर उसके पीछे समुद्र में कूद पड़ा जिससे वह राजकुमार जलकांत मणि से बने हुए सप्तखंडी प्रासाद पर जा गिरा। फिर धीरे धीरे नीचे उतर कर कुमार नीचे के खंड में पहुँचा। वहाँ उसने कल्पवृक्ष की शाखा से बंधे हुए पर्यंक पर एक अत्यन्त सुन्दर स्त्री को सूक्ष्म वस्त्र से सम्पूर्ण शरीर को ढ़ाके हुए सोती हुई देखा। उसने उस वस्त्र को थोड़ासा हटाया कि-उस स्त्रीने तुरन्त ही खड़ी होकर उस कुमार को उसी पलंग पर बैठाया और उससे उसका कुल-नाम आदि का हाल पूछा। कुमारने उसका यथोचित उत्तर देकर जब उसने भी उसका वृत्तान्त पूछा तो वह अपना यथास्थित स्वरूप बतलाने लगी कि-
वैताढ्य पर्वत की दक्षिण श्रेणी में विद्युत्प्रभ नामक राजा है। जिसकी मैं मणिमंजरी नामक पुत्री हूँ। एक बार मेरे पिताने मुझे योग्य वय में आई हुई जान कर किसी नैमित्तिक से पूछा कि "मेरी पुत्री के योग्य वर कब मिलेगा ?" इस के उत्तर में उसने कहा कि- "हे राजा ! समुद्र में जलकांत मणि का महल बना कर कल्पवृक्ष की शाखा के साथ पलंग बांध उस पर तुम्हारी पुत्री को रक्खो। वहाँ सुरसेन राजा का पुत्र संग्रामसूर आएगा जो इसका पति होगा।" इस प्रकार उस निमित्तिये के कहने से मेरे पिताने वैसा ही कर मुझे यहाँ रखा है। यहाँ रहते हुए मुझे कई दिनों के पश्चात् आज तुम्हारे दर्शन हुए हैं।"
इस प्रकार वे दोनों परस्पर प्रेमवार्ता कर ही रहे थे कि उस समय हाथ में नंगी तलवार लिये हुए, तालमताल वृक्ष सदृश श्याम और भयंकर कपालवाला एक राक्षस एकाएक वहाँ प्रकट होकर कुमार से कहने लगा कि "हे कुमार ! मैं सात दिन से भूखा हूँ। तूं मेरे भक्ष्य के साथ लग्न करने की क्यों कर अभिलाषा करता है ?" ऐसा कह कर वह राक्षस मणिमंजरी को झांझर सहित पैर से निगलने लगा जिसे देख कर कुमारने अत्यन्त जोर से उस पर खड्ग का प्रहार किया परन्तु उस खड्ग से राक्षस को किसी भी प्रकार के चोंट पहुंचाये बिना ही दो टुकड़े हो गये तो कुमारने उसके साथ बाहु युद्ध आरम्भ किया। जिस में भी राक्षसने कुमार को धराशायी कर बांध दिया। फिर राक्षसने उससे कहा कि "हे राजपुत्र ! यदि तुझे तेरी प्रिया को छोड़ाना हो तो मुझे अन्य कोई स्त्री या तेरी स्थूलकाय नामक दासी को खाने के लिये दे अथवा कदाचित् यह भी न कर सके तो मेरे गुरु चरक परिव्राजक को प्रणाम कर या मेरे प्रासाद में विष्णु की मूत्ति के साथ जिनप्रतिमा भी हैं। उसको तूं प्रणाम कर, पूजा कर या मेरी ही प्रतिमा करवा कर उसकी तूं सदैव पूजा किया कर, अन्यथा मैं इसको पूरी की पूरी खा जाऊंगा।" यह सुन कर कुमारने कहा कि "हे राक्षस! चाहे मेरे जीवन का ही अन्त क्यों न हो जाय परन्तु मैं जिनेश्वर तथा सुसाधु के अतिरिक्त अन्य को नमस्कार कदापि नहीं कर सकता तथा बिना प्रयोजन तब मैं स्थावर जीव की भी हिंसा नहीं करता तो दूसरे जीवों की हिंसा करने देने की तो बात करना ही वृथा है। हे देव ! तुझे भी इस प्रकार बोलना अनुचित है।" यह सुन कर राक्षसने कहा कि "हे राजपुत्र ! तो तूं इस जिनालय में चल और वहाँ जो वीतराग का बिम्ब है उसी की तूं पूजा कर।" यह बात स्वीकार कर कुमार हर्षपूर्वक उस जिनालय में गया तो उस बिम्ब को दूसरे लोगों द्वारा पूजा किया हुआ पाया इससे वह तुरन्त ही वहाँ से वापस लौट आया और बोला कि "हे देव ! चाहे मेरा शिरच्छेद क्यों न कर दिया जाय। परन्तु मैं तेरे वचनों का पालन नहीं कर सकता ।" उसका इस प्रकार दृढ़ निश्चय जान कर राक्षस मणिमंजरी को पैर से निगलने लगा। उस समय वह बाला अत्यन्त करुण स्वर से विलाप करने लगी कि "हे प्राणप्रिय ! हे नाथ! मुझे मृत्यु से बचाओ, मेरी रक्षा करो !" इस प्रकार विलाप करती हुई उस बाला को कंठ पर्यन्त निगल कर राक्षसने कुमार से कहा कि "हे मूर्खशिरोमणी ! यदि तूं दासी को भी नहीं देना चाहता हो तो केवल एक बकरी ही दे दे, अन्यथा मैं इस स्त्री का भक्षण कर बाद में तेरा भी भक्षण करूंगा।" यह सुन कर कुमारने उत्तर दिया कि "जब मैं कल्पांतकाल तक भी तेरी आज्ञा का पालन नहीं कर सकता तो फिर बारंबार पूछने से क्या प्रयोजन ?" इस प्रकार उसके दृढ़ निश्चय से संतुष्ट हो कर वह राक्षस शीघ्र ही अपना दिव्य स्वरूप प्रकट कर बोला कि "हे. साहसिकशिरोमणि ! देवेन्द्र द्वारा की गई तेरी प्रशंसा को न मान कर मैं यहाँ तेरी परीक्षा लेने आया था। किन्तु तेरे प्रसाद से मुझे भी समकित प्राप्त हो गया है।" ऐसा कह कर वह देव उसका गांधर्व लग्न कर स्वर्ग सिधारा । फिर कुमार भी मणिमंजरी से महोत्सवपूर्वक विवाह कर अपने नगर को लौट गया ।
कुमार को राज्य प्रदान कर उसके पिताने भी दीक्षा ग्रहण की। संग्रामसूर राजा भी श्रावकधर्म का प्रतिपालन कर पाँचवें देवलोक में देवता हुआ। जहाँ से च्यवकर एक अवतार धारण कर मोक्षपद को प्राप्त करेगा ।
राजाओं में श्रेष्ठ संग्रामसूर राजा दो यतनों के विषय में दृढ़ चित्त हो कष्ट पड़ने पर भी अहिंसादिक नियमों का पालन कर पाँचवें देवलोक में सिधारा ।
यह कहानी जैन साहित्य में दया और अहिंसा का महत्व दर्शाती है।
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