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ऋषभदेव भगवान को 400 दिन तक आहार क्यों नहीं मिला? वर्षीतप का रहस्य जानिए

ऋषभदेव भगवान के रहस्यमय वर्षीतप की कथा

ऋषभदेव भगवान को 400 दिन तक आहार क्यों नहीं मिला


जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव का वर्षीतप एक अत्यंत अद्भुत और रहस्यमय घटना मानी जाती है। आश्चर्य की बात यह है कि भगवान ने वर्षीतप करने की इच्छा नहीं की थी, फिर भी उन्हें लगातार 400 दिनों तक आहार प्राप्त नहीं हुआ

आइए जानते हैं इस घटना के पीछे का गहरा आध्यात्मिक कारण।

ऋषभदेव भगवान को 400 दिन तक आहार क्यों नहीं मिला?

एक छोटी सलाह और अंतरायकर्म का बंध

एक दिन एक बड़े श्रेष्ठी मार्ग से गुजर रहे थे। उसी समय उन्होंने देखा कि एक किसान अपने बैल को बुरी तरह पीट रहा है, क्योंकि वह लगातार खेत की फसल खा रहा था।

यह दृश्य देखकर श्रेष्ठी को करुणा आई। उन्होंने किसान से कहा कि बैल को पीटने के बजाय उसका मुँह बाँध दो ताकि वह फसल न खा सके।

किसान ने उनकी सलाह मान ली और बैल का मुँह लगातार 12 घंटों तक बाँधकर रखा। इससे बैल भूखा रह गया और अत्यंत पीड़ा सहनी पड़ी।

जैन कर्म सिद्धांत के अनुसार, इस छोटी-सी सलाह के कारण श्रेष्ठी के भव में अंतरायकर्म का बंध हो गया।

वही कर्म बना भगवान के वर्षीतप का कारण

समय बीतने के बाद वही श्रेष्ठी आगे चलकर भगवान ऋषभदेव के रूप में जन्मे

पूर्व जन्म में बंधा हुआ अंतरायकर्म इस जन्म में उदय में आया। यही कारण था कि जब भगवान ऋषभदेव आहार के लिए निकलते, तब उन्हें लगातार 400 दिनों तक आहार प्राप्त नहीं हुआ

हर दिन वे भिक्षा के लिए जाते, लेकिन खाली हाथ लौट आते।

हस्तिनापुर के लोग यह देखकर आश्चर्य करते और कहते कि भगवान कुछ स्वीकार ही नहीं करते।

श्रेयांसकुमार के अद्भुत स्वप्न

एक रात हस्तिनापुर के राजा सोमयशा के पुत्र श्रेयांसकुमार ने एक अद्भुत स्वप्न देखा।

उन्होंने देखा कि काजल के समान काले सुमेरु पर्वत का उन्होंने अमृत से भरे घड़ों से अभिषेक किया, जिससे पर्वत अत्यंत चमकने लगा।

उसी रात सुबुद्धि नामक सेठ ने भी स्वप्न देखा कि सूर्य से गिरती हजारों किरणों को श्रेयांसकुमार ने फिर से सूर्य में स्थापित कर दिया।

राजा सोमयशा ने भी उसी रात एक स्वप्न देखा जिसमें अनेक शत्रुओं से घिरे राजा को अपने पुत्र श्रेयांस की सहायता से विजय प्राप्त हुई।

सुबह जब तीनों मिले और अपने-अपने स्वप्न सुनाए, तो सभी ने कहा कि आज श्रेयांसकुमार को अवश्य ही कोई विशेष पुण्य लाभ होगा।

जातिस्मरण ज्ञान और प्रभु का पारणा

उसी दिन श्रेयांसकुमार महल में बैठे थे। तभी उन्होंने मार्ग से गुजरते हुए भगवान ऋषभदेव को देखा।

उन्हें तुरंत जातिस्मरण ज्ञान हो गया और उन्हें पूर्व जन्म की बातें स्मरण हो गईं।

उसी समय एक किसान वहाँ आया और उसने श्रेयांसकुमार को ईक्षु रस से भरे 108 घड़े भेंट किए।

श्रेयांसकुमार को निर्दोष भिक्षा देने की विधि का ज्ञान हो चुका था। उन्होंने विनम्रतापूर्वक भगवान से निवेदन किया:

“हे भगवान! कृपया इस पवित्र इक्षु रस को स्वीकार करें।”

इसके बाद श्रेयांसकुमार ने 108 घड़ों के इक्षु रस से भगवान ऋषभदेव का पारणा करवाया।

अक्षय तृतीया का पावन पर्व

यह घटना वैशाख मास की शुक्ल तृतीया के दिन हुई थी।

उस दिन दिया गया यह दान अक्षय माना गया, इसलिए यह पावन दिन आज भी अक्षय तृतीया के नाम से प्रसिद्ध है।

जैन परंपरा में यह दिन विशेष रूप से भगवान ऋषभदेव के वर्षीतप के पारणा के रूप में मनाया जाता है।


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