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400 साल पहले एक मंत्री जयमलजी ने अकाल में बचाई हजारों लोगों की जान, आज भी याद किया जाता है उनका नाम

मारवाड़ का गौरव: मारवाड़ के वह दीवान जिन्होंने अकाल में जनता को बचाया और इतिहास में अमर हो गए

मारवाड़ का गौरव: मारवाड़ के वह दीवान जिन्होंने अकाल में जनता को बचाया और इतिहास में अमर हो गए


जोधपुर में महाराजा गजसिंह के शासनकाल में, राज्य के प्रशासन में जो ओसवाल जैन जुड़े हुए थे, उनमें अनुभवी और कुशल मुत्सद्दी के रूप में मंत्रीश्वर जयमलजी का स्थान सबसे अग्रणी था। मारवाड़ राज्य के इतिहास में उनकी विभिन्न प्रकार की सेवाओं का उल्लेख मिलता है।

ओसवाल जाति में मुहणोत एक प्रसिद्ध गोत्र है। इसकी परंपरा जोधपुर के राव राठौड़ सीहा से प्रारंभ मानी जाती है। सीहा के पुत्र आसथान, उसके बाद धूहड़ और धूहड़ के पुत्र रायपाल हुए। रायपाल के तेरह पुत्र थे। उनमें दूसरे पुत्र मोहन्सिंह के नाम से मुहणोत गोत्र की उत्पत्ति हुई।

हमारे इस कथा-नायक का जन्म मुहणोत वंश के सूजा के प्रपौत्र, अमला के पौत्र और जेसा के दूसरे पुत्र के रूप में हुआ था। उनकी माता का नाम जयवंतदे (जसमादे) था। उनका जन्म विक्रम संवत 1638 के महा सुदी 9, बुधवार के दिन हुआ था। जेसा और जसमादे के इस पुत्र ने राजनीतिक और धार्मिक दोनों क्षेत्रों में अपने नाम से बहुत यश प्राप्त किया। उन्हें जो संपत्ति प्राप्त हुई, उसका उपयोग उन्होंने दान के कार्यों में भी किया।

जयमलजी का पहला विवाह वैद्य मेहता लालचंद्र की पुत्री सरूपदे के साथ हुआ था, जिससे उनके चार पुत्र हुए  नैणसी, सुन्दरसिंह, आशकरण और नरसिंहदास।

उनका दूसरा विवाह सिंघवी बिडदसिंह की पुत्री सुहादे के साथ हुआ, जिससे एक पुत्र हुआ जिसका नाम जगमाल रखा गया।

विक्रम संवत 1672 में फलोदी में महाराजा सूरसिंहजी की सत्ता स्थापित होने पर वहाँ के शासन का दायित्व जयमलजी को सौंपा गया। दिल्ली के बादशाह जहांगीर की ओर से गजसिंह को जालौर का परगना प्राप्त हुआ। उस नए नगर के शासक के रूप में जयमलजी की नियुक्ति की गई। इसके अतिरिक्त राजपरिवार की ओर से उन्हें हवेली, बाग आदि स्थावर संपत्ति भी भेंट में मिली (वि. सं. 1677)

संवत 1683 में महाराजा गजसिंह के पुत्र अमरसिंह को नागौर परगना प्राप्त हुआ। वहाँ के हाकिम के रूप में सबसे पहले जयमलजी का ही चयन किया गया।

इस प्रकार नए-नए और विभिन्न स्थानों पर शासन चलाना आसान कार्य नहीं होता। उसमें भी राजा और प्रजा दोनों का प्रेम प्राप्त करना अत्यंत कठिन माना जाता है। मंत्रीश्वर जयमलजी ने अपनी कार्यकुशलता से इन सभी परीक्षाओं को सफलतापूर्वक पार किया।

उन्हें बाड़मेर जाना पड़ा। विक्रम संवत 1684 के आसपास की स्थिति बिगड़ गई थी। बागी सरदार कर देने से इंकार कर रहे थे। राज्य की बागडोर संभालकर जयमलजी ने सबसे पहले उन सरदारों को वश में किया। पोखरण, राऊदड़ा और मेवास के नायकों से दंड वसूला और वर्षों से बाकी कर भी वसूल कर लिया।

विक्रम संवत 1686 में जयमलजी की इस योग्यता, राज्य के प्रति उनकी निष्ठा और अद्भुत ईमानदारी को देखकर महाराजा गजसिंह ने उन्हें दीवान पद पर नियुक्त किया। इस महत्वपूर्ण पद को उन्होंने जीवन के अंत तक सम्मानपूर्वक निभाया।

विक्रम संवत 1687 में मारवाड़ और गुजरात में भयंकर अकाल पड़ा। अन्न के अभाव से लोग अत्यंत संकट में आ गए। उस समय मंत्रीश्वर जयमलजी ने परोपकार की भावना से दूर-दूर से अनाज मंगवाकर जनता तक पहुँचाया और लगभग एक वर्ष तक संकट में पड़े लोगों को मुफ्त अन्न, पानी और वस्त्र उपलब्ध कराए।

तपागच्छ परंपरा का पालन करने वाले इस महामात्य ने जहाँ राज्यकार्य में वीरता दिखाई, वहीं अपनी दानशीलता से जनता में भी उच्च स्थान प्राप्त किया। उन्होंने उदारता से धार्मिक कार्यों में भी धन का उपयोग किया। जालौर, सांचौर, नाडोल, शत्रुंजय और जोधपुर आदि नगरों में बने सुंदर मंदिर आज भी उनकी कीर्ति का वर्णन करते हैं।

जालौर में महाराजा कुमारपाल द्वारा बनवाया गया मंदिर जीर्ण अवस्था में पहुँच गया था। उस स्थान का जीर्णोद्धार कर जयमलजी ने नया मंदिर बनवाया और संवत 1681 के चैत्र वदी पंचमी के दिन भगवान महावीर स्वामी की सुंदर प्रतिमा की प्रतिष्ठा करवाई। किले में अन्य दो जैन मंदिर भी हैं। ये तीनों मंदिर आज भी मंत्रीश्वर की कीर्ति का प्रचार कर रहे हैं। यह प्रतिष्ठा आचार्य श्री विजयदेवसूरी के समय हुई थी। जालौर नगर के तपापाड़ा मोहल्ले में भी एक देवालय और उपाश्रय उनके द्वारा बनवाया गया माना जाता है।

मारवाड़ के प्रसिद्ध ऐतिहासिक नगर सांचौर में भी उन्होंने संवत 1681 में जैन जिनालय बनवाया। जोधपुर में संवत 1686 में चौमुखजी का मंदिर बनवाया। इसी प्रकार संवत 1683 में श्री शत्रुंजय गिरिराज और नाडोल में भी देवस्थान बनवाकर मूर्तियों की प्रतिष्ठा करवाई।

नाडोल मारवाड़ का एक प्रसिद्ध नगर है। यहाँ श्री पद्मप्रभु का प्रसिद्ध जिनालय है। मूलनायक श्री पद्मप्रभु की प्रतिमा जयमलजी ने बनवाई, उसकी प्रतिष्ठा जालौर में करवाई और बाद में उसे नाडोल के रायविहार जिनालय में स्थापित किया। मूलनायक के पास श्री शांतिनाथ की प्रतिमा है, जिसके शिलालेख से ज्ञात होता है कि उसके निर्माता भी मंत्रीश्वर जयमलजी ही थे।

संवत 1683 में जयमलजी ने संघ निकालकर श्री शत्रुंजय, श्री रैवताचल (गिरनार) और श्री अर्बुदाचल (आबू) की यात्राएँ भी की थीं।

धर्म, अर्थ और काम इन तीन पुरुषार्थों को संतुलित रूप से निभाने वाला यह महान व्यक्तित्व चौथे पुरुषार्थ मोक्ष के निकट पहुँचे, इसमें आश्चर्य क्या है? धन्य है ऐसा जीवन।

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