मुग़ल सम्राट अकबर और जैन आचार्य: जब एक कट्टर बादशाह ने अपनाया 'अहिंसा' का मार्ग (विस्तृत इतिहास)
प्रस्तावना
भारतीय इतिहास के पन्नों में मुग़ल सम्राट जलालुद्दीन मुहम्मद अकबर को उनकी कूटनीति, विशाल साम्राज्य और 'दीन-ए-इलाही' के लिए जाना जाता है। लेकिन, इतिहास का एक बेहद रोचक और कम चर्चित अध्याय उनका जैन धर्म के प्रति झुकाव है। एक ऐसा बादशाह जिसका जीवन युद्धों और शिकार में बीता हो, वह अचानक पशु-पक्षियों के वध पर रोक लगा दे और जैन संतों के सामने नतमस्तक हो जाए—यह कोई साधारण घटना नहीं थी।
यह लेख विस्तार से बताता है कि कैसे गुजरात के श्वेतांबर जैन आचार्यों ने अपने ज्ञान, तपस्या और वैराग्य से मुग़ल दरबार की पूरी वैचारिक दिशा को बदल दिया था।
1. अकबर की आध्यात्मिक बेचैनी और 'इबादत खाना'
अकबर एक अत्यंत जिज्ञासु शासक था। 1575 ई. में उसने फ़तेहपुर सीकरी में 'इबादत खाना' (प्रार्थना गृह) का निर्माण करवाया था। शुरुआत में यहाँ केवल इस्लामिक विद्वान आते थे, लेकिन बाद में अकबर ने इसे हिंदू, ईसाई, पारसी और जैन विद्वानों के लिए भी खोल दिया। अकबर जीवन, मृत्यु, ईश्वर और कर्म के वास्तविक अर्थ को समझना चाहता था। इसी खोज के दौरान उसे गुजरात में निवास करने वाले एक महान जैन तपस्वी के बारे में पता चला।
2. गुजरात से मुग़ल दरबार तक का ऐतिहासिक सफर
उस समय गुजरात के सूबेदार (गवर्नर) शहाबुद्दीन अहमद खान ने अकबर को श्वेतांबर तपागच्छ परंपरा के महान संत आचार्य हीरविजय सूरी के कठोर तप और ज्ञान के बारे में बताया।
अकबर ने तुरंत शाही फरमान और बहुमूल्य उपहारों के साथ अपने दूतों को आचार्य को आगरा आमंत्रित करने के लिए भेजा।
- अद्भुत वैराग्य: जैन भिक्षु होने के नाते आचार्य हीरविजय सूरी ने हाथी, घोड़े या शाही पालकी में बैठने से स्पष्ट इंकार कर दिया। उन्होंने और उनके 67 शिष्यों ने गुजरात के अहमदाबाद से आगरा (फ़तेहपुर सीकरी) तक की सैकड़ों मील की यात्रा नंगे पैर (पैदल) तय की।
- जब अकबर को यह पता चला कि एक बुजुर्ग संत केवल उसके निमंत्रण का मान रखने के लिए महीनों पैदल चलकर आ रहे हैं और मार्ग में केवल भिक्षा का भोजन ग्रहण कर रहे हैं, तो बादशाह का हृदय श्रद्धा से भर गया।
3. अकबर और आचार्य हीरविजय सूरी का संवाद: जब गूंजा जैन दर्शन
1582 ई. में आचार्य मुग़ल दरबार पहुँचे। अकबर ने स्वयं आगे बढ़कर उनका स्वागत किया। दोनों के बीच कई हफ्तों तक धर्म चर्चा चली।
- अहिंसा पर जोर: आचार्य ने बादशाह को जैन दर्शन के मूल सिद्धांत 'अनेकांतवाद' (सत्य के कई पहलू) और 'अहिंसा परमो धर्म:' का पाठ पढ़ाया। उन्होंने समझाया कि ईश्वर की बनाई किसी भी रचना (जीव-जंतु) को नष्ट करने का अधिकार किसी मनुष्य (यहाँ तक कि बादशाह) को भी नहीं है।
- धन का त्याग: अकबर ने आचार्य को सोने, चांदी और हीरे-जवाहरात भेंट करने चाहे, लेकिन आचार्य ने कहा, "राजन! हम दिगंबर/श्वेतांबर संत हैं। हमारे लिए मिट्टी और सोना एक समान हैं।" इस निःस्वार्थ वैराग्य ने अकबर पर जादू सा असर किया।
- प्रभावित होकर अकबर ने आचार्य हीरविजय सूरी को 'जगतगुरु' (World Teacher) की सर्वोच्च उपाधि से अलंकृत किया।
4. मुग़ल साम्राज्य में हुए ऐतिहासिक और जमीनी बदलाव
जैन आचार्यों के प्रभाव में आकर अकबर ने अपने साम्राज्य में कई ऐसे फरमान (Royal Decrees) जारी किए, जो उस समय के किसी भी मुस्लिम शासक के लिए अकल्पनीय थे:
- अहिंसा का पालन (जीव हत्या पर रोक): अकबर ने आदेश दिया कि जैनियों के सबसे बड़े पर्व 'पर्युषण' के दौरान पूरे मुग़ल साम्राज्य में 12 दिनों तक कोई पशु नहीं काटा जाएगा। बाद में इसे बढ़ाकर 6 महीने कर दिया गया।
- तीर्थ स्थलों को कर-मुक्त करना: अकबर ने एक शाही फरमान जारी करके गुजरात के शत्रुंजय पर्वत (पालीताना), जूनागढ़ के गिरनार जी, माउंट आबू, और तारंगा हिल्स जैसे पवित्र जैन तीर्थों को जैन समुदाय को सौंप दिया और वहां से हर प्रकार का टैक्स हटा दिया।
- शिकार से तौबा: अकबर जो कभी शिकार का बहुत बड़ा शौकीन था, उसने आचार्य के उपदेशों के बाद शिकार करना लगभग छोड़ दिया। उसने शुक्रवार और रविवार को मांस खाना भी त्याग दिया।
- कैदियों और पक्षियों की रिहाई: सम्राट ने पिंजरे में कैद हजारों पक्षियों को आज़ाद कर दिया और मामूली अपराधों में बंद कई कैदियों को भी क्षमा दान दिया।
5. मुग़ल दस्तावेज़ों में प्रमाण: अबुल फज़ल की 'आईन-ए-अकबरी'
यह केवल जैन साहित्य का दावा नहीं है, बल्कि मुग़ल इतिहास में भी इसके पक्के सबूत हैं। अकबर के नवरत्नों में से एक और मुख्य इतिहासकार अबुल फज़ल (Abu'l-Fazl) ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक 'आईन-ए-अकबरी' में उस समय के 140 सबसे महान विद्वानों की सूची बनाई है।
- इस सूची में अबुल फज़ल ने आचार्य हीरविजय सूरी, भानुचंद्र उपाध्याय और विजयसेन सूरी जैसे जैन आचार्यों को शीर्ष श्रेणी (Highest Class of Scholars) में रखा है।
6. आचार्य जिनचंद्र सूरी और युग प्रधान की उपाधि
हीरविजय सूरी के जाने के बाद भी मुग़ल दरबार में जैन प्रभाव कम नहीं हुआ। 1591 में खरतरगच्छ परंपरा के आचार्य जिनचंद्र सूरी मुग़ल दरबार (लाहौर) पहुँचे।
- जब अकबर कश्मीर जा रहा था, तब भारी बारिश के कारण नाव डूबने लगी थी। कहा जाता है कि आचार्य के आध्यात्मिक प्रभाव से वे सुरक्षित बच गए।
- अकबर ने आचार्य जिनचंद्र सूरी को 'युग प्रधान' (अपने युग का सबसे महान व्यक्ति) की उपाधि दी और उनके कहने पर खंभात की खाड़ी में मछली पकड़ने पर सख्त पाबंदी लगा दी। उनके शिष्य भानुचंद्र उपाध्याय ने तो अकबर को 'सूर्य सहस्रनाम' (सूर्य के 1000 नाम) का पाठ भी रटा दिया था।
निष्कर्ष
अकबर और जैन आचार्यों का यह मिलन केवल दो अलग-अलग धर्मों का मिलन नहीं था, बल्कि यह सत्ता (Power) और वैराग्य (Renunciation) का मिलन था। मुग़ल बादशाह के पास दुनिया भर की दौलत और ताकत थी, लेकिन जो शांति और सत्य उसे जैन मुनियों के नंगे पैरों और सादे जीवन में मिला, वह किसी युद्ध या विजय से नहीं मिल सका। भारतीय इतिहास में जैन धर्म का यह स्वर्ण युग यह साबित करता है कि सच्ची शक्ति हथियारों में नहीं, बल्कि 'अहिंसा और करुणा' में निवास करती है।
