कलिंग नरेश खारवेल: जैन धर्म के महान संरक्षक और उनके हाथीगुम्फा शिलालेख का विस्तृत इतिहास
प्रस्तावना: इतिहास के पन्नों से एक गुमनाम शूरवीर और धर्म रक्षक की दास्तान
प्राचीन भारतीय इतिहास जब भी लिखा या पढ़ा जाता है, तो अक्सर मगध साम्राज्य, मौर्य वंश, या गुप्त काल की चर्चाएँ मुख्य केंद्र में रहती हैं। लेकिन इन सब के बीच भारत के पूर्वी तट पर स्थित 'कलिंग' (वर्तमान उड़ीसा) के एक ऐसे महान प्रतापी और धर्मपरायण सम्राट का उदय हुआ था, जिसने न केवल मगध के अहंकार को तोड़ा, बल्कि प्राचीन जैन धर्म को उसका सबसे बड़ा राज्याश्रय भी प्रदान किया। उस महान सम्राट का नाम था कलिंग नरेश खारवेल (Emperor Kharavela)।
प्रथम शताब्दी ईसा पूर्व (1st Century BCE) में महामेघवाहन वंश (चेदि वंश) में जन्मे सम्राट खारवेल भारत के उन गिने-चुने सम्राटों में से एक हैं, जिन्होंने अजेय सैन्य शक्ति के साथ-साथ जैन धर्म के 'अहिंसा', 'त्याग' और 'श्रमण' संस्कृति को अपने जीवन और राजकाज का मूल आधार बनाया। खारवेल का जीवन इस बात का प्रमाण है कि एक शासक चक्रवर्ती सम्राट होने के साथ-साथ एक सच्चा 'श्रावक' (जैन धर्म का अनुयायी) भी हो सकता है।
खारवेल के बारे में आज हमें जो भी प्रामाणिक जानकारी मिलती है, उसका एकमात्र और सबसे बड़ा स्रोत उड़ीसा की उदयगिरि पहाड़ियों में स्थित 'हाथीगुम्फा शिलालेख' (Hathigumpha Inscription) है। आइए, इस लेख में हम विस्तार से जानते हैं सम्राट खारवेल के जीवन, उनके विजय अभियानों, जैन धर्म के प्रति उनके अटूट समर्पण और उस ऐतिहासिक शिलालेख के बारे में जिसने इस महान शासक को इतिहास के पन्नों में अमर कर दिया।
1. ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: अशोक का कलिंग युद्ध और कलिंग का पुनरुत्थान
सम्राट खारवेल के उदय को समझने के लिए हमें थोड़ा पीछे जाना होगा। मौर्य सम्राट अशोक ने 261 ईसा पूर्व में कलिंग पर एक भयानक आक्रमण किया था, जिसे इतिहास में 'कलिंग युद्ध' के नाम से जाना जाता है। इस युद्ध में लाखों लोग मारे गए थे और कलिंग पूरी तरह से तबाह हो गया था। अशोक ने इस युद्ध के बाद बौद्ध धर्म अपना लिया था, लेकिन कलिंग के लोगों के दिलों में मगध के प्रति एक गहरी टीस और अपने खोए हुए स्वाभिमान को वापस पाने की तड़प हमेशा बनी रही।
अशोक की मृत्यु के बाद मौर्य साम्राज्य धीरे-धीरे कमजोर पड़ने लगा। इसी राजनीतिक शून्यता का लाभ उठाकर कलिंग ने स्वयं को मगध की दासता से स्वतंत्र कर लिया। कलिंग में 'महामेघवाहन वंश' (Mahameghavahana Dynasty) की स्थापना हुई, जिसे 'चेदि वंश' भी कहा जाता है। इसी वंश की तीसरी पीढ़ी में एक ऐसे बालक का जन्म हुआ जो कलिंग का खोया हुआ गौरव वापस लाने वाला था—वह बालक था 'खारवेल'।
2. सम्राट खारवेल का प्रारंभिक जीवन और शिक्षा (जैन संस्कारों का बीजारोपण)
हाथीगुम्फा शिलालेख खारवेल के जन्म और उनके प्रारंभिक जीवन की बहुत ही सुंदर और स्पष्ट जानकारी देता है। शिलालेख के अनुसार, खारवेल का शरीर जन्म से ही अत्यंत आकर्षक, पुष्ट और तेजवान था। उनके बचपन का नाम संभवतः 'भिक्षुराज' था, जो उनके जैन धर्म के प्रति झुकाव को दर्शाता है।
- राजकीय शिक्षा: 15 वर्ष की आयु तक खारवेल ने युवराज के रूप में सभी प्रकार की आवश्यक शिक्षाएं प्राप्त कीं। उन्होंने 'लेख' (Writing/Documentation), 'रूप' (Coinage/Currency), 'गणना' (Mathematics/Accounting), 'व्यवहार' (Law/Administration), और 'विधि' (Rules of Governance) का गहन अध्ययन किया।
- गंधर्व वेद के ज्ञाता: वे युद्ध कला में तो निपुण थे ही, साथ ही उन्हें 'गंधर्व वेद' (संगीत और नृत्य कला) का भी गहरा ज्ञान था।
- राज्याभिषेक: 15 वर्ष की आयु में उन्हें युवराज घोषित किया गया और 9 वर्षों तक उन्होंने प्रशासन के गुर सीखे। अंततः 24 वर्ष की आयु में खारवेल का 'कलिंग राज्याभिषेक' हुआ और वे कलिंग के पूर्ण शासक बन गए। उनके राज्याभिषेक के साथ ही कलिंग के इतिहास का एक नया और स्वर्णिम अध्याय शुरू हुआ।
3. हाथीगुम्फा शिलालेख: भारतीय इतिहास का सबसे जीवंत दस्तावेज़
सम्राट खारवेल के जीवन और उनके जैन धर्म के प्रति समर्पण को सिद्ध करने वाला सबसे बड़ा और एकमात्र प्रामाणिक साक्ष्य उड़ीसा की राजधानी भुवनेश्वर के पास उदयगिरि पहाड़ी (प्राचीन नाम: कुमारी पर्वत) की एक गुफा में खुदा हुआ है। इस गुफा को आज 'हाथीगुम्फा' (Elephant Cave) कहा जाता है।
शिलालेख की मुख्य विशेषताएँ:
- भाषा और लिपि: यह शिलालेख प्राकृत भाषा और प्राचीन ब्राह्मी लिपि में लिखा गया है।
- पंक्तियां: इसमें कुल 17 पंक्तियां हैं, जो चट्टान को गहराई से काटकर उकेरी गई हैं।
- खोज: इस शिलालेख को सबसे पहले 1820 ईस्वी में ए. स्टर्लिंग (A. Stirling) ने खोजा था। बाद में जेम्स प्रिंसेप (James Prinsep) और प्रख्यात भारतीय पुरालेखविद् भगवानलाल इंद्रजी (Bhagwanlal Indraji) ने इसका सटीक अनुवाद किया।
जैन नवकार मंत्र से शुरुआत:
हाथीगुम्फा शिलालेख की सबसे बड़ी और ऐतिहासिक विशेषता इसकी शुरुआत है। कोई भी हिंदू या बौद्ध शिलालेख आम तौर पर अपने देवताओं की स्तुति से शुरू होता है, लेकिन खारवेल का यह शिलालेख विशुद्ध रूप से जैन प्रार्थना के साथ शुरू होता है:
"नमो अरिहंतानं, नमो सवसिधानं" (Namo Arihantanam, Namo Savasidhanam) (अर्थात: सभी अरिहंतों को मेरा नमस्कार है, सभी सिद्धों को मेरा नमस्कार है।)
यह जैन धर्म का परम पवित्र 'नवकार मंत्र' (णमोकार मंत्र) है। किसी राजशाही शिलालेख की शुरुआत में नवकार मंत्र का होना इस बात का सबसे बड़ा और अकाट्य प्रमाण है कि कलिंग नरेश खारवेल एक कट्टर और समर्पित जैन श्रावक थे।
4. खारवेल का सैन्य अभियान: मगध का घमंड तोड़ना और 'कलिंग जिन' की वापसी
जैन धर्म में यद्यपि 'अहिंसा' को सर्वोपरि माना गया है, लेकिन एक राजा के लिए अपने राज्य की रक्षा करना और अपने धर्म के सम्मान की रक्षा करना भी उसका परम कर्तव्य है। खारवेल ने आक्रामक साम्राज्यवादी नीतियां नहीं अपनाईं, बल्कि उनके युद्ध उनके राज्य के स्वाभिमान और धार्मिक धरोहर को वापस लाने के लिए थे।
हाथीगुम्फा शिलालेख में खारवेल के शासन के 13 वर्षों का वर्ष-वार (Year-by-Year) विवरण दर्ज है। इसी में उनका सबसे महान सैन्य अभियान 'मगध पर विजय' शामिल है।
'कलिंग जिन' का अपहरण और वापसी का ऐतिहासिक संघर्ष:
खारवेल से लगभग 300 वर्ष पूर्व, जब मगध पर नंद वंश के क्रूर शासक महापद्मनंद का राज था, तब उसने कलिंग पर आक्रमण किया था। उस समय महापद्मनंद कलिंग से बहुमूल्य संपदा के साथ-साथ जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव (आदिनाथ) की अत्यंत पवित्र और प्राचीन मूर्ति लूट कर मगध ले गया था। इस मूर्ति को इतिहास में 'कलिंग जिन' (Kalinga Jina) या 'अग्र जिन' कहा गया है। कलिंग के लोगों के लिए यह मूर्ति केवल एक पत्थर नहीं थी, बल्कि उनकी आस्था, उनके राष्ट्र का गौरव और कलिंग की आत्मा थी।
- मगध पर चढ़ाई: अपने शासन के 12वें वर्ष में, सम्राट खारवेल ने मगध पर एक विशाल सेना के साथ आक्रमण किया। उस समय मगध पर शुंग वंश (संभवतः पुष्यमित्र शुंग के उत्तराधिकारी या राजा बृहस्पति मित्र) का शासन था।
- मगध नरेश का समर्पण: खारवेल की अजेय सेना ने मगध की राजधानी पाटलिपुत्र को घेर लिया। मगध के राजा बृहस्पति मित्र को खारवेल के चरणों में झुकना पड़ा।
- गौरव की वापसी: खारवेल ने मगध से न केवल अपार धन-संपदा प्राप्त की, बल्कि 300 वर्षों से मगध में रखी अपने आराध्य 'कलिंग जिन' की पवित्र प्रतिमा को ससम्मान वापस कलिंग लेकर आए।
जब कलिंग जिन की मूर्ति वापस कलिंग पहुँची, तो पूरे राज्य में एक भव्य उत्सव मनाया गया। यह केवल एक धार्मिक मूर्ति की वापसी नहीं थी, बल्कि यह कलिंग के उस स्वाभिमान की वापसी थी जिसे सदियों पहले मगध ने रौंद दिया था। इस घटना ने खारवेल को कलिंग के इतिहास का सबसे महान नायक और जैन धर्म का सबसे बड़ा रक्षक बना दिया।
5. दक्षिण और पश्चिम भारत पर खारवेल की विजय पताका
खारवेल केवल मगध तक ही सीमित नहीं रहे; उन्होंने अपने साम्राज्य का विस्तार उत्तर से लेकर सुदूर दक्षिण तक किया:
- सातवाहन साम्राज्य से युद्ध (शासन का दूसरा वर्ष): खारवेल ने पश्चिम दिशा में अपनी सेना भेजी और शक्तिशाली सातवाहन शासक 'शातकर्णी' (Satakarni) की परवाह न करते हुए उनकी सेनाओं को पीछे धकेल दिया। उनकी सेना कृष्णा नदी (कण्णवेणा) तक पहुँच गई और 'मूषिक नगर' में भय उत्पन्न कर दिया।
- विद्याधरों और रठिकों पर विजय: शासन के चौथे वर्ष में उन्होंने रठिकों (Rathikas) और भोजकों (Bhojakas) को पराजित किया, जो महाराष्ट्र और बरार के आसपास के क्षेत्रों के शासक थे। उन्हें खारवेल के चरणों में अपने मुकुट रखने पड़े।
- दक्षिण के तमिल संघ का पतन: शासन के 11वें वर्ष में खारवेल ने दक्षिण भारत के शक्तिशाली तमिल राज्यों (चोल, चेर और पांड्य) के एक प्राचीन संघ (Tamil Confederacy) को नष्ट कर दिया। उन्होंने पांड्य राजा को भारी मात्रा में घोड़े, हाथी, मोती और मणि भेंट करने पर मजबूर कर दिया।
इतने युद्ध लड़ने के बावजूद, खारवेल के अभियानों में क्रूरता या अकारण रक्तपात का वर्णन नहीं मिलता। उनके युद्ध एक चक्रवर्ती सम्राट के धर्म-विजय (Dharma-Vijaya) अभियान के समान थे।
6. उदयगिरि और खंडगिरि की गुफाएँ: जैन मुनियों के लिए एक स्थायी आश्रय
एक महान शासक होने के साथ-साथ खारवेल एक समर्पित जैन श्रावक थे। जैन धर्म में साधु-संत (श्रमण) किसी एक स्थान पर नहीं रुकते, वे लगातार पदयात्रा (विहार) करते हैं। लेकिन वर्षा ऋतु (चातुर्मास/Chaturmas) के चार महीनों में जैन मुनियों को एक ही स्थान पर रुकना अनिवार्य होता है ताकि बारिश के दौरान जमीन पर पनपने वाले सूक्ष्म जीवों की उनके चलने से हत्या न हो।
- कुमारी पर्वत (उदयगिरि) का निर्माण: अपने शासन के 13वें वर्ष में, जैन श्रमणों, यतियों, तपस्वियों और ऋषियों के चातुर्मास प्रवास के लिए सम्राट खारवेल ने भुवनेश्वर के पास 'कुमारी पर्वत' (वर्तमान उदयगिरि और खंडगिरि) की चट्टानों को कटवाकर 100 से अधिक भव्य गुफाओं का निर्माण करवाया।
- रानी गुम्फा (Rani Gumpha): इन गुफाओं में सबसे विशाल और सुंदर 'रानी गुम्फा' है। यह दो मंजिला गुफा है जिसमें शानदार नक्काशी, जैन देवी-देवताओं की आकृतियां, और राजा-रानियों के धार्मिक कार्यों को दर्शाती हुई मूर्तियां उकेरी गई हैं।
- स्वर्गपुरी और मंचपुरी गुफाएँ: खारवेल की पटरानी (मुख्य रानी) 'सिंधुला' ने भी जैन मुनियों के लिए 'स्वर्गपुरी' गुफा का निर्माण करवाया था।
खारवेल ने इन गुफाओं के सामने एक भव्य जैन परिषद (Jain Council) का भी आयोजन किया था, जिसमें पूरे भारत से जैन आचार्य और विद्वान एकत्रित हुए थे। इस परिषद का उद्देश्य प्राचीन जैन आगमों (शास्त्रों) का संरक्षण करना था, जो समय के साथ विलुप्त हो रहे थे।
7. जनकल्याण और लोक विकास के कार्य (प्रजा का कल्याण ही राजधर्म)
जैन धर्म का एक और प्रमुख सिद्धांत 'परोपकार' और 'जीवदया' है। खारवेल ने अपनी प्रजा को अपनी संतान के समान माना। हाथीगुम्फा शिलालेख केवल उनके युद्धों का वर्णन नहीं करता, बल्कि उनके द्वारा किए गए भारी जन-कल्याण कार्यों का भी उल्लेख करता है:
- नगर का पुनर्निर्माण: अपने शासन के पहले ही वर्ष में खारवेल ने कलिंग की राजधानी के उन द्वारों, प्राचीरों और भवनों की मरम्मत करवाई जो तूफान के कारण क्षतिग्रस्त हो गए थे। इसके लिए उन्होंने 35 लाख (सिक्कों) की भारी धनराशि खर्च की।
- नहरों का निर्माण और विस्तार: कृषि को बढ़ावा देने के लिए, खारवेल ने अपने शासन के 5वें वर्ष में, उस प्राचीन नहर का विस्तार अपनी राजधानी तक करवाया, जिसे 300 वर्ष पूर्व नंद राजा ने बनवाया था। यह भारत के इतिहास में जल प्रबंधन और सिंचाई का एक बेहतरीन उदाहरण है।
- संगीत और कला का संरक्षण: खारवेल युद्ध-प्रेमी होने के साथ-साथ कला-प्रेमी भी थे। उन्होंने कलिंग की जनता के मनोरंजन के लिए नृत्य, संगीत, और नाटक के कई भव्य उत्सव आयोजित करवाए।
- कर मुक्ति और अनुदान: उन्होंने ब्राह्मणों, जैन मुनियों और गरीब जनता को भारी मात्रा में दान दिया। शिलालेख में उन्हें 'राजर्षि' (राजा + ऋषि) कहा गया है।
8. जैन धर्म में सम्राट खारवेल का योगदान और उनकी विरासत
भारतीय इतिहास में सम्राट अशोक को बौद्ध धर्म का, और गुप्त सम्राटों को वैदिक (सनातन) धर्म का सबसे बड़ा संरक्षक माना जाता है। ठीक उसी प्रकार, जैन धर्म के इतिहास में जो स्थान उत्तर भारत में चंद्रगुप्त मौर्य का है, वही स्थान पूर्वी भारत में सम्राट खारवेल का है।
यदि सम्राट खारवेल का उदय नहीं होता, तो कलिंग युद्ध के बाद अशोक द्वारा स्थापित बौद्ध धर्म के प्रभाव में उड़ीसा से जैन धर्म के निशान शायद हमेशा के लिए मिट जाते। खारवेल ने न केवल जैन धर्म को कलिंग का राजधर्म बनाया, बल्कि उसे वह सम्मान और सुरक्षा प्रदान की जिससे वह पूरे पूर्वी भारत में फलता-फूलता रहा।
धार्मिक सहिष्णुता: खारवेल यद्यपि एक पक्के जैन अनुयायी थे, लेकिन उन्होंने कभी किसी अन्य धर्म का उत्पीड़न नहीं किया। शिलालेख में उन्हें "सर्व पाषंड पूजको" (सभी धर्मों का सम्मान करने वाला) और "सर्व देवायतन संस्कारको" (सभी देव-मंदिरों की मरम्मत कराने वाला) कहा गया है। यह जैन धर्म के मूल सिद्धांत 'अनेकांतवाद' (विभिन्न विचारों का सम्मान) का साक्षात् उदाहरण है।
9. निष्कर्ष: एक अपराजेय योद्धा और एक विनम्र श्रावक
कलिंग नरेश खारवेल का इतिहास इस बात का जीवंत प्रमाण है कि धर्म और सत्ता, वैराग्य और शौर्य एक साथ रह सकते हैं। वे युद्ध के मैदान में एक ऐसे तूफ़ान थे जिसके आगे शक्तिशाली मगध और दक्षिण के राजाओं के घुटने टिक गए, लेकिन उदयगिरि की पहाड़ियों पर जैन मुनियों के सामने वे एक अत्यंत विनम्र और सेवाभावी शिष्य थे।
हाथीगुम्फा का शिलालेख आज भी समय की आंधियों को झेलता हुआ सीना ताने खड़ा है, जो दुनिया को बता रहा है कि एक समय भारत के पूर्वी तट पर महामेघवाहन वंश के उस महान चक्रवर्ती सम्राट का राज था, जिसने जैन धर्म की 'अहिंसा' को अपनी कायरता नहीं, बल्कि अपनी सबसे बड़ी ताकत बनाया था।
भारतीय इतिहास और जैन दर्शन, सम्राट खारवेल के इस अभूतपूर्व योगदान के लिए सदैव उनके ऋणी रहेंगे।
