अभिनन्दन नाथ चालीसा हिंदी में | Shri Abhinandan Nath Bhagwan Chalisa Lyrics - Jain Stuti Stavan

श्री अभिनन्दन नाथ चालीसा: सम्पूर्ण पाठ, बोल और अचूक लाभ (Abhinandan Nath Chalisa Lyrics)

अभिनन्दन नाथ चालीसा हिंदी में  Shri Abhinandan Nath Bhagwan Chalisa Lyrics - Jain Stuti Stavan


जैन धर्म के चौथे (4th) तीर्थंकर भगवान अभिनन्दन नाथ जी की स्तुति में रचित श्री अभिनन्दन नाथ चालीसा (Shri Abhinandan Nath Chalisa) अत्यंत कल्याणकारी है। अयोध्या नगरी में राजा संवर और माता सिद्धार्था के यहाँ जन्मे भगवान अभिनन्दन नाथ का पावन चिन्ह 'बंदर' (कपि/वानर) है। सच्चे मन से इस चालीसा का पाठ करने से जन्म-मरण के बंधन टूट जाते हैं और भक्त को मोक्ष मार्ग की प्राप्ति होती है।

नीचे jainstutistavan.com पर श्री अभिनन्दन नाथ चालीसा के सम्पूर्ण बोल (Lyrics) और इसके नित्य पाठ से होने वाले अद्भुत लाभों का वर्णन किया गया है।

श्री अभिनन्दन नाथ चालीसा (Shri Abhinandan Nath Chalisa Lyrics in Hindi)

ऋषभ – अजित – सम्भव अभिनन्दन, दया करे सब पर दुखभंजन
जनम – मरन के टुटे बन्धन, मन मन्दिर तिष्ठें अभिनन्दन ।।

अयोध्या नगरी अती सुंदर, करते राज्य भूपति संवर ।।
सिद्धार्था उनकी महारानी, सूंदरता में थी लासानी ।।

रानी ने देखे शुभ सपने, बरसे रतन महल के अंगने ।।
मुख में देखा हस्ति समाता, कहलाई तीर्थंकर माता ।।

जननी उदर प्रभु अवतारे, स्वर्गो से आए सुर सारे ।।
मात पिता की पूजा करते, गर्भ कल्याणक उत्सव करते ।।

द्धादशी माघ शुक्ला की आई, जन्मे अभिनन्दन जिनराई ।।
देवो के भी आसन काँपे, शिशु को ले कर गए मेरू पे ।।

न्हवन किया शत – आठ कलश से, अभिनन्दन कहा प्रेम भाव से ।।
सूर्य समान प्रभु तेजस्वी, हुए जगत में महायशस्वी ।।

बोले हित – मित वचन सुबोध, वाणी में नही कही विरोध ।।
यौवन से जब हुए विभूषित, राज्यश्री को किया सुशोभित ।।

साढे तीन सौ धनुष प्रमान, उन्नत प्रभु – तन शोभावान ।।
परणाई कन्याएँ अनेक, लेकिन छोडा नही विवेक ।।

नित प्रती नूतन भोग भोगते, जल में भिन्न कमल सम रहते ।।
इक दिन देखे मेघ अम्बर में, मेघ महल बनते पल भर में ।।

हुए विलीन पवन चलने से, उदासीन हो गए जगत से ।।
राजपाट निज सुत को सौंपा, मन में समता – वृक्ष को रोपा ।।

गए उग्र नामक उध्य़ान, दीक्षीत हुए वहाँ गुणखान ।।
शुक्ला द्धादशी थी माघ मास, दो दिन का धारा उपवास ।।

तिसरे दिन फिर किया विहार, इन्द्रदत नृपने दिया आहार ।।
वर्ष अठारह किया घोर तप, सहे शीत – वर्षा और आतप ।।

एक दिन असन वृक्ष के निचे, ध्यान वृष्टि से आतम सींचे ।।
उदय हुआ केवल दिनकर का, लोका लोक ज्ञान में झसका ।।

हुई तब समोशरण की रचना, खिरी प्रभु की दिव्य देशना ।।
जीवाजीव और धर्माधर्म, आकाश – काल षटद्रव्य मर्म ।।

जीव द्रव्य ही सारभूत है, स्वयंसिद्ध ही परमपूत है ।।
रूप तीन लोक – समझाया, ऊध्र्व – मध्य – अधोलोक बताया ।।

नीचे नरक बताए सात, भुगते पापी अपने पाप ।।
ऊपर सओसह सवर्ग सुजान, चतुनिर्काय देव विमान ।।

मध्य लोक में द्धीप असँख्य, ढाई द्धीप में जायें भव्य ।।
भटको को सन्मार्ग दिखाया, भव्यो को भव – पार लगाया ।।

पहुँचे गढ़ सम्मेद अन्त में, प्रितमा योग धरा एकान्त में ।।
शुक्लध्यान में लीन हुए तब, कर्म प्रकृती क्षीण हुई सब ।।

वैसाख शुक्ला षष्ठी पुण्यवान, प्रातः प्रभु का हुआ निर्वाण ।।
मोक्ष कल्याणक करें सुर आकर, आनन्दकूट पूजें हर्षाकर ।।

चालीसा श्रीजिन अभिनन्दन, दूर करे सबके भवक्रन्दन ।।
स्वामी तुम हो पापनिकन्दन, हम सब करते शतशत

H2: अभिनन्दन नाथ चालीसा पाठ के अचूक लाभ (Benefits of Abhinandan Nath Chalisa)

चालीसा की प्रथम और अंतिम पंक्तियों में इसके अनगिनत लाभ छुपे हैं। नियमित रूप से इसका पठन करने से भक्तों को निम्नलिखित फल प्राप्त होते हैं:

  • जन्म-मरण के बंधनों से मुक्ति: "जनम – मरन के टुटे बन्धन" - इस पाठ के नित्य स्मरण से जीवात्मा संसार के जन्म और मरण के चक्र से मुक्त हो जाती है।

  • पापों का नाश: "स्वामी तुम हो पापनिकन्दन" - भगवान अभिनन्दन नाथ की करुणा से मनुष्य द्वारा जाने-अनजाने में किए गए सभी पाप कर्म नष्ट हो जाते हैं।

  • सांसारिक कष्टों (भवक्रन्दन) से रक्षा: "दूर करे सबके भवक्रन्दन" - संसार के दुःख, संताप और हर प्रकार के मानसिक व शारीरिक कष्ट इस चालीसा के प्रभाव से दूर हो जाते हैं।

  • समता और वैराग्य की भावना: जिस प्रकार भगवान "जल में भिन्न कमल सम रहते" थे, यह पाठ व्यक्ति को मोह-माया के बीच रहकर भी अनासक्त (Detached) रहना सिखाता है।

चालीसा का पाठ कैसे करें? 

प्रातः काल उठकर स्नानादि से शुद्ध हो जाएं। एक एकांत और पवित्र स्थान पर भगवान अभिनन्दन नाथ जी की प्रतिमा या चित्र के समक्ष बैठें। दीपक प्रज्वलित कर पूर्ण एकाग्रता और भक्ति भाव से Shri Abhinandan Nath Chalisa का पाठ करें।

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