श्री सुपार्श्वनाथ चालीसा हिंदी में | Shri Suparshvanath Chalisa Lyrics - Jain Stuti Stavan

श्री सुपार्श्वनाथ चालीसा: सम्पूर्ण पाठ, बोल और संकट मोचन लाभ (Suparshvanath Chalisa Lyrics)

श्री सुपार्श्वनाथ चालीसा: सम्पूर्ण पाठ, बोल और संकट मोचन लाभ (Suparshvanath Chalisa Lyrics)


जैन धर्म के ७वें (7th) तीर्थंकर भगवान सुपार्श्वनाथ जी की स्तुति में रचित श्री सुपार्श्वनाथ चालीसा (Shri Suparshvanath Chalisa) अत्यंत मंगलकारी और शांति प्रदायक है। वाराणसी नगरी में राजा सुप्रतिष्ठित और रानी पृथ्वीसेना के यहाँ जन्मे भगवान सुपार्श्वनाथ का पावन चिन्ह 'स्वास्तिक' (Swastika) है। मान्यता है कि सच्चे मन से इस चालीसा का पाठ करने से भक्तों के सभी संकट कट जाते हैं और क्रोध व काम जैसे विकारों का नाश हो जाता है।

नीचे jainstutistavan.com पर श्री सुपार्श्वनाथ चालीसा के सम्पूर्ण बोल (Lyrics) और इसके नित्य पाठ से होने वाले अद्भुत लाभों का वर्णन किया गया है।

श्री सुपार्श्वनाथ चालीसा (Shri Suparshvanath Chalisa Lyrics in Hindi)


लोक शिखर के वासी है प्रभु, तीर्थंकर सुपार्श्व जिनराज ।।
नयन द्वार को खोल खडे हैं, आओ विराजो हे जगनाथ ।।

सुन्दर नगर वारानसी स्थित, राज्य करे राजा सुप्रतिष्ठित ।।
पृथ्वीसेना उनकी रानी, देखे स्वप्न सोलह अभिरामी ।।

तीर्थंकर सुत गर्भमें आए, सुरगण आकर मोद मनायें ।।
शुक्ला ज्येष्ठ द्वादशी शुभ दिन, जन्मे अहमिन्द्र योग में श्रीजिन ।।

जन्मोत्सव की खूशी असीमित, पूरी वाराणसी हुई सुशोभित ।।
बढे सुपार्श्वजिन चन्द्र समान, मुख पर बसे मन्द मुस्कान ।।

समय प्रवाह रहा गतीशील, कन्याएँ परणाई सुशील ।।
लोक प्रिय शासन कहलाता, पर दुष्टो का दिल दहलाता ।।

नित प्रति सुन्दर भोग भोगते, फिर भी कर्मबन्द नही होते ।।
तन्मय नही होते भोगो में, दृष्टि रहे अन्तर – योगो में ।।

एक दिन हुआ प्रबल वैराग्य, राजपाट छोड़ा मोह त्याग ।।
दृढ़ निश्चय किया तप करने का, करें देव अनुमोदन प्रभु का ।।

राजपाट निज सुत को देकर, गए सहेतुक वन में जिनवर ।।
ध्यान में लीन हुए तपधारी, तपकल्याणक करे सुर भारी ।।

हुए एकाग्र श्री भगवान, तभी हुआ मनः पर्यय ज्ञान ।।
शुद्धाहार लिया जिनवर ने, सोमखेट भूपति के ग्रह में ।।

वन में जा कर हुए ध्यानस्त, नौ वर्षों तक रहे छद्मस्थ ।।
दो दिन का उपवास धार कर, तरू शिरीष तल बैठे जा कर ।।

स्थिर हुए पर रहे सक्रिय, कर्मशत्रु चतुः किये निष्क्रय ।।
क्षपक श्रेणी में हुए आरूढ़, ज्ञान केवली पाया गूढ़ ।।
सुरपति ज्ञानोत्सव कीना, धनपति ने समो शरण रचीना ।।

विराजे अधर सुपार्श्वस्वामी, दिव्यध्वनि खिरती अभिरामी ।।
यदि चाहो अक्ष्य सुखपाना, कर्माश्रव तज संवर करना ।।

अविपाक निर्जरा को करके, शिवसुख पाओ उद्यम करके ।।
चतुः दर्शन – ज्ञान अष्ट बतायें, तेरह विधि चारित्र सुनायें ।।

सब देशो में हुआ विहार, भव्यो को किया भव से पार ।।
एक महिना उम्र रही जब, शैल सम्मेद पे, किया उग्र तप ।।

फाल्गुन शुक्ल सप्तमी आई, मुक्ती महल पहुँचे जिनराई ।।
निर्वाणोत्सव को सुर आये । कूट प्रभास की महिमा गाये ।।

स्वास्तिक चिन्ह सहित जिनराज, पार करें भव सिन्धु – जहाज ।।
जो भी प्रभु का ध्यान लगाते, उनके सब संकट कट जाते ।।

चालीसा सुपार्श्व स्वामी का, मान हरे क्रोधी कामी का ।।
जिन मंदिर में जा कर पढ़ना, प्रभु का मन से नाम सुमरना ।।
हमको है दृढ़ विश्वास, पूरण होवे सबकी आस ।।

सुपार्श्वनाथ चालीसा पाठ के अचूक लाभ (Benefits of Suparshvanath Chalisa)

इस चालीसा के अंतिम छंदों में इसके अनगिनत लाभ स्पष्ट रूप से वर्णित हैं। जो भी भव्य जीव नित्य इसका पाठ करता है, उसे निम्नलिखित फल प्राप्त होते हैं:

  • संकटों से मुक्ति: "जो भी प्रभु का ध्यान लगाते, उनके सब संकट कट जाते" - भगवान सुपार्श्वनाथ की भक्ति से जीवन के सभी शारीरिक, मानसिक और सांसारिक संकट दूर हो जाते हैं।

  • भव-सिंधु से पार: स्वास्तिक चिन्ह वाले जिनराज जीवन रूपी नौका को संसार के भव-सिंधु से पार लगाते हैं।

  • क्रोध और काम का नाश: "मान हरे क्रोधी कामी का" - इस पाठ के प्रभाव से मनुष्य के भीतर छुपे हुए क्रोध, काम-वासना और अहंकार का नाश होता है तथा मन में वैराग्य व समता का भाव जागृत होता है।

  • मनोकामना पूर्ति: सच्चे मन से भगवान का नाम सुमिरन करने से हर मनोकामना (आस) पूर्ण होती है।

चालीसा का पाठ कैसे करें?

चालीसा में ही निर्देशित है कि "जिन मंदिर में जा कर पढ़ना।" सर्वोत्तम फल की प्राप्ति के लिए प्रातः काल स्नानादि कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें और निकटतम जैन मंदिर में जाकर भगवान सुपार्श्वनाथ जी की प्रतिमा के समक्ष यह पाठ करें। यदि मंदिर जाना संभव न हो, तो घर के एकांत और पवित्र स्थान पर प्रभु के चित्र या 'स्वास्तिक' चिन्ह के समक्ष दीपक प्रज्वलित कर पूर्ण श्रद्धा से Shri Suparshvanath Chalisa का पाठ करें।

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