फागण सुद 13 (तेरस) का जैन धर्म में महत्व: 8.5 करोड़ आत्माओं के मोक्ष की गाथा और 'छः गाऊँ की यात्रा' का रहस्य
जैन धर्म में तीर्थों का, तपस्या का और आत्म-कल्याण का एक बहुत ही गहरा और वैज्ञानिक महत्व है। जब भी हम जैन धर्म के शाश्वत तीर्थों की बात करते हैं, तो श्री शत्रुंजय महातीर्थ (पालीताणा) का नाम सबसे ऊपर आता है। वैसे तो इस पावन गिरिराज की वंदना साल भर होती है, लेकिन जैन पंचांग के अनुसार फागण सुद 13 (फाल्गुन शुक्ल त्रयोदशी) का दिन इस तीर्थ के लिए एक अद्वितीय और अकल्पनीय ऊर्जा लेकर आता है।
इसी दिन पालीताणा में विश्व प्रसिद्ध 'छः गाऊँ की यात्रा' (6 Gaon Feri) की जाती है, जिसमें लाखों की संख्या में जैन श्रद्धालु पूरे संयम और भक्ति के साथ नंगे पैर इस दुर्गम पहाड़ी का सफर तय करते हैं। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि सिर्फ इसी दिन इतनी बड़ी यात्रा क्यों की जाती है? फागण सुद 13 के पीछे का वह कौन सा अनसुना इतिहास है जो आज भी हर जैन के रोंगटे खड़े कर देता है? आइए, इस लेख में फागण सुद 13 के ऐतिहासिक, पौराणिक और आध्यात्मिक महत्व की गहराई में उतरते हैं।
1. फागण सुद 13 का ऐतिहासिक और पौराणिक इतिहास (History & Legend)
फागण सुद 13 का दिन किसी सामान्य उत्सव का दिन नहीं है; यह एक मोक्ष-कल्याणक का दिन है। यह वह दिन है जब इस धरती से एक साथ करोड़ों आत्माओं ने जन्म-मरण के चक्र से हमेशा के लिए मुक्ति पाई थी।
जैन धर्म के शास्त्रों के अनुसार, यह घटना 22वें तीर्थंकर भगवान श्री नेमिनाथ स्वामी के समय की है। भगवान श्रीकृष्ण के पुत्र— शाम्ब (Samba) और प्रद्युम्न (Pradyumna) ने सांसारिक सुखों का त्याग कर भगवान नेमिनाथ के पास दीक्षा ग्रहण की थी। दीक्षा के पश्चात, उन्होंने कठोर तपस्या का मार्ग चुना और अपने 8.5 करोड़ (साढ़े आठ करोड़) मुनि भगवंतों के साथ श्री शत्रुंजय गिरिराज (पालीताणा) की ओर विहार किया।
शत्रुंजय पर्वत के भाड़वा डूंगर (Bhadva Dungar) पर पहुँचकर इन सभी मुनियों ने घोर तपस्या (अनशन/संथारा) की। फाल्गुन शुक्ल त्रयोदशी (फागण सुद 13) के उसी पवित्र दिन, शाम्ब और प्रद्युम्न कुमार ने अपने 8.5 करोड़ मुनियों के साथ अपने सभी कर्मों का क्षय किया और मोक्ष (सिद्ध पद) को प्राप्त किया।
जरा कल्पना कीजिए! एक ही दिन, एक ही स्थान से 8.5 करोड़ आत्माएं सिद्ध शिला पर विराजमान हो गईं। इसी महान घटना की स्मृति में और उन सिद्ध आत्माओं के प्रति अपनी कृतज्ञता (विनय) प्रकट करने के लिए हर साल फागण सुद 13 को लाखों लोग छः गाऊँ की यात्रा करते हैं।
2. क्या है 'छः गाऊँ की यात्रा' (Chha Gaon Ni Yatra)?
जैन धर्म में 'गाऊ' (Gaon/Gau) दूरी मापने की एक प्राचीन इकाई है। छः गाऊँ का मतलब लगभग 12 से 15 मील (करीब 18-20 किलोमीटर) की पैदल यात्रा है। यह कोई साधारण ट्रैकिंग नहीं है; यह एक आध्यात्मिक परिक्रमा (Feri) है जो शत्रुंजय पर्वत के विशिष्ट मार्गों से होकर गुजरती है।
इस दिन श्रद्धालु सफेद वस्त्र धारण करते हैं। पूरी यात्रा नंगे पैर, बिना कुछ खाए-पिए (उपवास या पानी के सख्त नियमों के साथ) की जाती है। इस यात्रा का उद्देश्य सिर्फ शारीरिक शक्ति का प्रदर्शन नहीं है, बल्कि अपनी आत्मा को कष्ट सहने की आदत डालना और उन मुनियों के कष्टों का स्मरण करना है जिन्होंने मोक्ष के लिए अपने शरीर को तपा दिया था।
3. छः गाऊँ यात्रा के मुख्य पड़ाव (Key Stops of the Journey)
यह यात्रा शत्रुंजय तलहटी से शुरू होती है और कई महत्वपूर्ण आध्यात्मिक पड़ावों से होकर गुजरती है। हर पड़ाव का अपना एक विशेष महत्व और इतिहास है:
चंदन तलावड़ी (Chandan Talavdi): चढ़ाई और परिक्रमा के दौरान यह एक बेहद पवित्र स्थान आता है। यहाँ पर एक छोटा सा तालाब है। इस स्थान की विशेषता यह है कि यहाँ पहुँचकर सभी श्रद्धालु जमीन पर लेटकर (काउस्सग्ग मुद्रा में) 'लोगस्स सूत्र' का पाठ करते हैं। यह उस थकान को मिटाने और आत्मा को स्थिरता प्रदान करने की एक अद्भुत क्रिया है।
श्री अजितनाथ और श्री शांतिनाथ भगवान की देहरी: यात्रा में आगे बढ़ने पर जैन धर्म के दूसरे तीर्थंकर भगवान अजितनाथ और 16वें तीर्थंकर भगवान शांतिनाथ की प्राचीन देहरियाँ (छोटे मंदिर) आते हैं। मान्यता है कि अतीत में इन दोनों तीर्थंकरों ने ठीक इसी स्थान पर समवसरण (Deshna/Sermons) की रचना की थी और जीवों को उपदेश दिया था। यहाँ दर्शन करने मात्र से मन में असीम शांति का अनुभव होता है।
भाड़वा डूंगर (Bhadva Dungar): यह इस पूरी यात्रा का चरम बिंदु (Climax) है। यह वही शिखर है जहाँ मुनि शाम्ब, प्रद्युम्न और 8.5 करोड़ मुनियों ने मोक्ष प्राप्त किया था। यह स्थान ऊर्जा का एक जीता-जागता पावरहाउस है। यहाँ पहुँचकर श्रद्धालु चैत्यवंदन करते हैं और मोक्ष जाने वाली उन अनंत आत्माओं को याद करके अपनी आंखों से श्रद्धा के आंसू छलकने देते हैं।
सिद्धवड (Siddhvad): पहाड़ी की परिक्रमा पूरी करने के बाद जब श्रद्धालु नीचे उतरते हैं, तो यह यात्रा 'सिद्धवड' नामक एक अत्यंत पवित्र और विशाल बरगद के पेड़ के पास समाप्त होती है। माना जाता है कि इस वृक्ष के नीचे भी अनगिनत आत्माओं ने साधना कर मोक्ष पाया है। यहाँ का दृश्य सबसे ज्यादा भावुक करने वाला होता है। जो श्रद्धालु 15 मील की कठिन यात्रा पूरी करके यहाँ पहुँचते हैं, उनका स्वागत करने के लिए हजारों लोग खड़े होते हैं। उनके थके हुए पैरों को धोया जाता है, उन्हें तिलक लगाया जाता है और 'पाल' (भोजन और पानी की व्यवस्था) द्वारा उनका पारणा (व्रत खोलना) करवाया जाता है। यह संघ-भावना (Community Devotion) का एक अप्रतिम उदाहरण है।
4. आध्यात्मिक दृष्टिकोण: फागण फेरी का जीवन में महत्व (Spiritual Significance)
आखिर आज के आधुनिक युग में इतनी कठिन यात्रा का क्या औचित्य है? जैन दर्शन इसके पीछे चार प्रमुख आध्यात्मिक कारण बताता है:
सिद्ध-भूमि का स्मरण (Remembrance of the Holy Land): जब आप उस मिट्टी पर चलते हैं जहाँ करोड़ों आत्माएं परमात्मा बनीं, तो आपके भीतर भी यह भाव जागृत होता है कि "यदि वे कर सकते हैं, तो मैं भी मोक्ष का अधिकारी हूँ।" यह सम्यक् दर्शन (Right Faith) को मजबूत करता है।
तप और संयम की परीक्षा (Test of Austerity): जब शरीर थकता है, धूप चुभती है और प्यास लगती है, तब भी व्यक्ति नवकार मंत्र और स्तवन गाता हुआ चलता है। यह स्वेच्छा से अपनाया गया कष्ट (तप) हमारे संचित पाप कर्मों (Paap Karmas) को निर्जरा (नष्ट) करने का सबसे शक्तिशाली तरीका है।
मौन और धर्म-ध्यान: इस यात्रा के दौरान सांसारिक बातें (व्यापार, परिवार, हंसी-मज़ाक, फोन का इस्तेमाल) वर्जित होती हैं। व्यक्ति पूरी तरह से स्वयं के भीतर झांकता है।
संघ यात्रा (Collective Punya): जब लाखों लोग एक ही दिन, एक ही भाव से तीर्थ की वंदना करते हैं, तो वहां एक सामूहिक आध्यात्मिक आभा (Aura) उत्पन्न होती है। इस संघ-भाव से व्यक्ति का पुण्योदय कई गुना बढ़ जाता है।
5. निष्कर्ष (Conclusion)
फागण सुद 13 केवल कलेंडर की एक तारीख नहीं है, बल्कि यह मानव आत्मा के उस चरम सामर्थ्य का उत्सव है जो शरीर की सीमाओं को लांघकर सिद्ध अवस्था तक पहुँच सकता है। छः गाऊँ की यात्रा हमें सिखाती है कि मोक्ष का मार्ग आसान नहीं है, इस पर कंकड़ भी हैं और कांटे भी, लेकिन अगर हृदय में प्रभु की भक्ति और पूर्वजों के प्रति विनय हो, तो बड़े से बड़ा पहाड़ भी पार किया जा सकता है। श्री शत्रुंजय महातीर्थ की भावयात्रा
आज के इस भागदौड़ भरे जीवन में, जहाँ हम भौतिक सफलताओं के पीछे भाग रहे हैं, फागण सुद 13 हमें रुककर अपनी आत्मा के वास्तविक लक्ष्य (मोक्ष) को पहचानने का संदेश देता है। जो व्यक्ति जीवन में एक बार भी पूरे भाव से यह फागण फेरी कर लेता है, उसके जीवन की दिशा और दशा हमेशा के लिए बदल जाती है।



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