श्री अजितनाथ चालीसा: पाठ, बोल और मंगलकारी लाभ (Ajitnath Chalisa Lyrics)
जैन धर्म के दूसरे तीर्थंकर भगवान अजितनाथ जी की स्तुति में रचित श्री अजितनाथ चालीसा (Shri Ajitnath Chalisa) अत्यंत मंगलकारी और पुण्यदायी है। यह चालीसा भगवान अजितनाथ के जीवन चरित्र का सुंदर वर्णन करता है, जिसमें अयोध्या नगरी में राजा जितराज (जितशत्रु) और माता विजयसेना के यहाँ उनका जन्म, वैराग्य धारण कर दिगंबर दीक्षा लेना, बारह वर्षों की कठिन तपस्या से केवल ज्ञान (दिव्यज्ञान) की प्राप्ति और अंततः श्री सम्मेद शिखर जी से मोक्ष गमन की कथा शामिल है। यह पाठ हमें सिखाता है कि किस प्रकार सम्यग्दर्शन और वीतराग भाव से अष्ट कर्मों को जीतकर आत्मा सिद्ध अवस्था को प्राप्त कर सकती है।
श्री अजितनाथ चालीसा (Shri Ajitnath Chalisa Lyrics in Hindi)
श्री आदिनाथ को शिश नवा कर, माता सरस्वती को ध्याय ।
शुरू करूँ श्री अजितनाथ का, चालीसास्व – सुखदाय ।।
जय श्री अजितनाथ जिनराज । पावन चिह्न धरे गजराज ।।
नगर अयोध्या करते राज । जितराज नामक महाराज ।।
विजयसेना उनकी महारानी । देखे सोलह स्वप्न ललामी ।।
दिव्य विमान विजय से चयकर । जननी उदर बसे प्रभु आकर ।।
शुक्ला दशमी माघ मास की । जन्म जयन्ती अजित नाथ की ।।
इन्द्र प्रभु को शीशधार कर । गए सुमेरू हर्षित हो कर ।।
नीर शीर सागर से लाकर । न्हवन करें भक्ति में भरकर ।।
वस्त्राभूषण दिव्य पहनाए । वापस लोट अयोध्या आए ।।
अजित नाथ की शोभा न्यारी । वर्ण स्वर्ण सम कान्तिधारी ।।
बीता बचपन जब हितकारी । हुआ ब्याह तब मंगलकारी ।।
कर्मबन्ध नही हो भोगो में । अन्तदृष्टि थी योगो में ।।
चंचल चपला देखी नभ में । हुआ वैराग्य निरन्तर मन में ।।
राजपाट निज सुत को देकर । हुए दिगम्बर दीक्षा लेकर ।।
छः दिन बाद हुआ आहार । करे श्रेष्ठि ब्रह्मा सत्कार ।।
किये पंच अचरज देवो ने । पुण्योपार्जन किया सभी ने ।।
बारह वर्ष तपस्या कीनी । दिव्यज्ञान की सिद्धि नवीनी ।।
धनपति ने इन्द्राज्ञा पाकर । रच दिया समोशरण हर्षाकर ।।
सभा विशाल लगी जिनवर की । दिव्यध्वनि खिरती प्रभुवर की ।।
वाद विवाद मिटाने हेतु । अनेकांत का बाँधा सेतु ।।
है सापेक्ष यहा सब तत्व । अन्योन्याश्रित है उन सत्व ।।
सब जिवो में है जो आतम । वे भी हो सक्ते शुद्धात्म ।।
ध्यान अग्नि का ताप मिले जब । केवल ज्ञान की की ज्योति जले तब ।।
मोक्ष मार्ग तो बहुत सरल है । लेकिन राहीहुए विरल है ।।
हीरा तो सब ले नही पावे । सब्जी भाजी भीङ धरावे ।।
दिव्यध्वनि सुन कर जिनवर की । खिली कली जन जन के मन की ।।
प्राप्ति कर सम्यग्दर्शन की । बगिया महकी भव्य जनो की ।।
हिंसक पशु भी समता धारे । जन्म जन्म का का वैर निवारे ।।
पूर्ण प्रभावना हुई धर्म की । भावना शुद्ध हुई भविजन की ।।
दुर दुर तक हुआ विहार । सदाचार का हुआ प्रचार ।।
एक माह की उम्र रही जब । गए शिखर सम्मेद प्रभु तब ।।
अखण्ङ मौन मुद्रा की धारण । कर्म अघाती हेतु निवारण ।।
शुक्ल ध्यान का हुआ प्रताप । लोक शिखर पर पहुँचे आप ।।
सिद्धवर कुट की भारी महिमा । गाते सब प्रभु के गुण – गरिमा ।।
विजित किए श्री अजित ने । अष्ट कर्म बलवान ।।
निहित आत्मगुण अमित है , अरूणा सुख की खान ।।
अजितनाथ चालीसा पाठ के अचूक लाभ (Benefits of Shri Ajitnath Chalisa)
भगवान अजितनाथ की स्तुति करने से भव्य जीवों को निम्नलिखित लाभ प्राप्त होते हैं:
कर्म बंधनों का नाश: "विजित किए श्री अजित ने, अष्ट कर्म बलवान।" इस पाठ के नित्य स्मरण से जन्म-जन्मांतर के कठोर अष्ट कर्म नष्ट हो जाते हैं।
समता और वैर मुक्ति: भगवान के ध्यान से हिंसक प्रवृत्तियां समाप्त होती हैं और प्राणी जन्म-जन्म के वैर भाव को भूलकर समता धारण करता है।
सम्यग्दर्शन की प्राप्ति: चालीसा के पाठ से मन में उठने वाले राग-द्वेष मिटते हैं और व्यक्ति को सत्य तत्व (अनेकांतवाद) का ज्ञान होता है, जिससे सम्यग्दर्शन की प्राप्ति होती है।
शाश्वत सुख (मोक्ष): यह पवित्र पाठ आत्मा को शुद्ध कर संसार के आवागमन से मुक्त कराता है और अंततः मोक्ष रूपी परम सुख की ओर ले जाता है।
चालीसा का पाठ कैसे करें?
प्रातः काल स्नानादि से निवृत्त होकर शुद्ध वस्त्र धारण करें। एक स्वच्छ और शांत स्थान पर भगवान अजितनाथ जी (जिनका पावन चिह्न गजराज/हाथी है) की प्रतिमा या चित्र के समक्ष बैठें। धूप-दीप जलाकर पूर्ण एकाग्रता और भक्ति भाव से Ajitnath Chalisa का पाठ करें।