श्री धर्मनाथ चालीसा: सम्पूर्ण पाठ, बोल और अचूक लाभ (Dharam Nath Chalisa Lyrics)
जैन धर्म के १५वें तीर्थंकर भगवान धर्मनाथ जी की स्तुति में रचित श्री धर्मनाथ चालीसा (Shri Dharam Nath Chalisa) एक अत्यंत मंगलकारी और पुण्यदायी पाठ है। भगवान धर्मनाथ ने जीवों को उत्तम क्षमा आदि दस धर्मों का मर्म समझाया और मोक्ष मार्ग प्रशस्त किया। सच्चे मन से इस चालीसा का पाठ करने से जीवन के सभी पाप, अधर्म और संताप नष्ट हो जाते हैं।
jainstutistavan.com के इस लेख में श्री धर्मनाथ चालीसा के सम्पूर्ण बोल (Lyrics) और इसके नित्य पाठ से होने वाले अद्भुत लाभों का वर्णन किया गया है।
श्री धर्मनाथ चालीसा (Shri Dharam Nath Chalisa Lyrics in Hindi)
उत्तम क्षमा अदि दस धर्म,प्रगटे मूर्तिमान श्रीधर्म ।
जग से हरण करे सन अधर्म, शाश्वत सुख दे प्रभु धर्म ।।
नगर रतनपुर के शासक थे, भूपति भानु प्रजा पालक थे।
महादेवी सुव्रता अभिन्न, पुत्रा आभाव से रहती खिन्न ।।
प्राचेतस मुनि अवधिलीन, मत पिता को धीरज दीन ।
पुत्र तुम्हारे हो क्षेमंकर, जग में कहलाये तीर्थंकर ।।
धीरज हुआ दम्पति मन में, साधू वचन हो सत्य जगत में ।
मोह सुरम्य विमान को तजकर, जननी उदर बसे प्रभु आकर ।।
तत्क्षण सब देवों के परिकर, गर्भाकल्याणक करें खुश होकर ।
तेरस माघ मास उजियारी, जन्मे तीन ज्ञान के धारी ।।
तीन भुवन द्युति छाई न्यारी, सब ही जीवों को सुखकारी ।
माता को निंद्रा में सुलाकर, लिया शची ने गोद में आकर ।।
मेरु पर अभिषेक कराया, धर्मनाथ शुभ नाम धराया ।
देख शिशु सौंदर्य अपार, किये इन्द्र ने नयन हजार ।।
बीता बचपन यौवन आया, अदभुत आकर्षक तन पाया ।
पिता ने तब युवराज बनाया, राज काज उनको समझाया ।।
चित्र श्रृंगारवती का लेकर, दूत सभा में बैठा आकर ।
स्वयंवर हेतु निमंत्रण देकर, गया नाथ की स्वीकृति लेकर ।।
मित्र प्रभाकर को संग लेकर, कुण्डिनपुर को गए धर्मं वर ।
श्रृंगार वती ने वरा प्रभु को, पुष्पक यान पे आये घर को ।।
मात पिता करें हार्दिक प्यार, प्रजाजनों ने किया सत्कार ।
सर्वप्रिय था उनका शासन, निति सहित करते प्रजापालन ।।
उल्कापात देखकर एकदिन, भोग विमुख हो गए श्री जिन ।
सूत सुधर्म को सौप राज, शिविका में प्रभु गए विराज ।।
चलते संग सहस नृपराज, गए शालवन में जिनराज ।
शुक्ल त्रयोदशी माघ महीना, संध्या समय मुनि पदवी गहिना ।।
दो दिन रहे ध्यान में लीना, दिव्या दीप्ती धरे वस्त्र विहिना ।
तीसरे दिन हेतु आहार, पाटलीपुत्र का हुआ विहार ।।
अन्तराय बत्तीस निखार, धन्यसेन नृप दे आहार ।
मौन अवस्था रहती प्रभु की, कठिन तपस्या एक वर्ष की ।।
पूर्णमासी पौष मास की, अनुभूति हुई दिव्यभास की ।
चतुर्निकाय के सुरगण आये, उत्सव ज्ञान कल्याण मनाये ।।
समोशरण निर्माण कराये, अंतरिक्ष में प्रभु पधराये ।
निराक्षरी कल्याणी वाणी, कर्णपुटो से पीते प्राणी ।।
जीव जगत में जानो अनन्त, पुद्गल तो हैं अनन्तानन्त ।
धर्म अधर्म और नभ एक, काल समेत द्रव्य षट देख ।।
रागमुक्त हो जाने रूप, शिवसुख उसको मिले अनूप ।
सुन कर बहुत हुए व्रतधारी, बहुतों ने जिन दीक्षा धारी ।।
आर्यखंड से हुआ विहार, भूमंडल में धर्मं प्रचार ।
गढ़ सम्मेद गए आखिर में, लीन हुए निज अन्तरंग में ।।
शुक्ल ध्यान का हुआ प्रताप, हुए अघाती धात निष्पाप ।
नष्ट किये जग के संताप, मुक्ति महल पहुचे आप ।।
सौरठा:-
ज्येष्ठ चतुर्थी शुक्ल पक्षवर, पूजा करे सुर, कूट सुदत्तवर ।
लक्षण वज्रदंड शुभ जान, हुआ धर्म से धर्म का मान ।।
जो प्रतिदिन प्रभु के गुण गाते, अरुणा वे भी शिवपद पाते ।।
धर्मनाथ चालीसा पाठ के अचूक लाभ (Benefits of Shri Dharamnath Chalisa)
- इस पवित्र चालीसा की पंक्तियों में इसके अनगिनत लाभ छुपे हैं। नियमित रूप से इसका पठन करने से भक्तों को निम्नलिखित फल प्राप्त होते हैं:
- पाप और अधर्म का नाश: "जग से हरण करे सन अधर्म" - इस पाठ के प्रभाव से मन के बुरे विचार, राग-द्वेष और सभी प्रकार के पाप कर्म नष्ट हो जाते हैं।
- शाश्वत सुख और मोक्ष की प्राप्ति: "शाश्वत सुख दे प्रभु धर्म" और "अरुणा वे भी शिवपद पाते" - जो भी भक्त प्रतिदिन प्रभु के गुणों का गान करता है, उसे जीवन में अनुपम सुख मिलता है और अंततः वह मोक्ष (शिवपद) को प्राप्त करता है।
- संताप और कष्टों से मुक्ति: "नष्ट किये जग के संताप" - भगवान धर्मनाथ की भक्ति जीवन के हर प्रकार के दुखों, कष्टों और शारीरिक-मानसिक संतापों को दूर कर शांति प्रदान करती है।
चालीसा का पाठ कैसे करें?
प्रातः काल स्नानादि से निवृत्त होकर स्वच्छ वस्त्र धारण करें। एक एकांत और पवित्र स्थान पर भगवान धर्मनाथ जी की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें। उनके समक्ष धूप-दीप जलाकर, पूर्ण एकाग्रता और भक्ति भाव से Shri Dharam Nath Chalisa का पाठ करें।
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