रोमे रोमे गिरनार गूंजे श्वासे श्वासे नेमिनाथ: लिरिक्स और भावार्थ (Rome Rome Girnar Lyrics)
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"रोमे रोमे गिरनार" एक अत्यंत मधुर और लोकप्रिय जैन स्तवन है जो २२वें तीर्थंकर भगवान नेमिनाथ (Shri Neminath Bhagwan) और उनकी मोक्ष भूमि, पावन गिरनार महातीर्थ को समर्पित है। इस गीत में एक भक्त के हृदय का वह सुंदर भाव प्रकट हुआ है, जहाँ उसे अपने रोम-रोम में गिरनार पर्वत की गूंज और हर श्वास में नेमिनाथ भगवान का वास महसूस होता है।
नीचे jainstutistavan.com पर इस भक्तिमय स्तवन के बोल और इसके गहरे अर्थ को समझाया गया है।
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रोमे रोमे गिरनार स्तवन (Rome Rome Girnar Lyrics)
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स्तवन का भावार्थ और महिमा (Meaning of Rome Rome Girnar Stavan)
इस गीत की हर पंक्ति भगवान नेमिनाथ के प्रति असीम श्रद्धा और समर्पण से भरी हुई है। इसका मुख्य सारांश इस प्रकार है:
सांसों में प्रभु का वास: भक्त प्रभु से कहता है कि मेरा आधार, मेरे मोक्ष का दाता और मेरा मार्गदर्शक केवल तू ही है। मेरी हर सांस में नेमिनाथ और शरीर के रोम-रोम में गिरनार तीर्थ बसा हुआ है।
गिरनार की पावनता: गिरनार पर्वत के शिखरों और कण-कण में भगवान के नाम का स्पंदन और कीर्तन महसूस होता है। शिवादेवी के नंदन (नेमिनाथ) का रूप अत्यंत शीतल और मन को शांति देने वाला है।
पूर्ण समर्पण (Surrender): भक्त अपना तन, मन और संपूर्ण जीवन भगवान के श्री चरणों में अर्पित करते हुए कहता है कि आप ही सुख देने वाले और दुख हरने वाले हो। प्रभु की कृपा से ही हमें यह पवित्र जिनशासन प्राप्त हुआ है।
भगवान नेमिनाथ और गिरनार तीर्थ
गिरनार पर्वत (उर्जयंत गिरि) जैन धर्म का एक शाश्वत और महान तीर्थ है। इसी पवित्र भूमि से भगवान नेमिनाथ ने मुनि दीक्षा ग्रहण की, केवल ज्ञान प्राप्त किया और अंततः मोक्ष पद पाया।
